एक प्राचीन आश्रम में एक संत रहते थे। वे कम बोलते थे, पर उनके पास बैठने भर से ही मन शांत हो जाता था। एक दिन एक किसान उनके पास आया। चेहरा थका हुआ, मन टूटा हुआ।
उसने कहा, “महाराज, मैंने जीवन भर ईमानदारी से काम किया। फिर भी कभी सूखा, कभी कर्ज़, कभी बीमारी—कष्ट ही कष्ट मिले। अब तो ईश्वर पर से भरोसा ही उठ गया है।”
संत कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, “कल सुबह मेरे साथ खेत चलना।”
अगली सुबह संत किसान के खेत पहुँचे। उन्होंने किसान से कहा, “इस खेत में जो बीज बोए गए हैं, उन्हें उखाड़ दो।”
किसान घबरा गया,“महाराज! बीज उखाड़ दिए तो फसल कैसे होगी?”
संत मुस्कराए, “तो फिर तुम ईश्वर से यह शिकायत क्यों करते हो कि वह बीज बोने के बाद उन्हें मिट्टी में दबा देता है, ऊपर से बारिश और धूप की मार भी सहने देता है?”
किसान चुप हो गया।
संत ने आगे कहा, “बीज अगर ऊपर ही पड़ा रहे तो सुरक्षित तो रहेगा, पर कभी पौधा नहीं बनेगा। मिट्टी में दबना, अँधेरा सहना, टूटना—ये दंड नहीं हैं, ये विकास की प्रक्रिया हैं।”
फिर संत ने एक गहरी बात कही— “ईश्वर के निर्णय तात्कालिक सुख के लिए नहीं होते। वे उस सुख के लिए होते हैं, जिसे अभी तुम देख नहीं पाते।”
किसान की आँखें भर आईं। उसने धीमे स्वर में कहा, “तो क्या मेरा कष्ट भी किसी फसल की तैयारी है?”
संत बोले, “हाँ। और जिस दिन यह समझ बैठ जाती है कि ईश्वर जो भी करता है, वह सबके अंतिम कल्याण के लिए करता है, उसी दिन मन में शिकायत नहीं, भरोसा जन्म लेता है।”
उस दिन किसान के हालात नहीं बदले थे, पर उसकी दृष्टि बदल चुकी थी। और संत जानते थे— दृष्टि बदल जाए, तो जीवन अपने आप दिशा पकड़ लेता है।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, भरोसा तब आता है, जब हम ईश्वर की योजना को अपने सीमित लाभ से नहीं, व्यापक कल्याण से देखना सीख लेते हैं।








