धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—948

महाभारत का प्रसंग है। कौरव-पांडवों के बीच युद्ध की स्थिति बन चुकी थी और दोनों पक्षों के बीच तनाव चरम पर था। शांति स्थापित करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण पांडवों की ओर से दूत बनकर हस्तिनापुर पहुंचे थे।

श्रीकृष्ण का उद्देश्य स्पष्ट था- युद्ध को किसी भी तरह टालना और दोनों पक्षों के बीच समझौता कराना। उन्होंने हस्तिनापुर की राजसभा में दुर्योधन को समझाने का प्रयास किया कि यह युद्ध केवल विनाश लाएगा, इसलिए इसे रोका जाना चाहिए। श्रीकृष्ण ने धैर्यपूर्वक उसे बताया कि पांडव न्याय चाहते हैं, सत्ता नहीं और थोड़ी सी भूमि देकर भी शांति स्थापित की जा सकती है, लेकिन दुर्योधन अपने अहंकार और सत्ता के मोह में अंधा हो चुका था। उसने श्रीकृष्ण की सलाह को अस्वीकार कर दिया।

इस घटना से पहले दुर्योधन ने शिष्टाचार के रूप में श्रीकृष्ण को अपने महल में भोजन के लिए आमंत्रित किया था। यह एक राजसी और औपचारिक निमंत्रण था। श्रीकृष्ण ने इस आमंत्रण को विनम्रता से अस्वीकार कर दिया। दुर्योधन आश्चर्यचकित हुआ और उसने पूछा कि जब सब कुछ सम्मान और वैभव के साथ दिया जा रहा है, तो आप हमारे यहां भोजन क्यों नहीं कर रहे हैं?

श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि दूत का धर्म है जब तक उसका कार्य पूरा न हो, वह किसी पक्ष का आतिथ्य स्वीकार नहीं करता, क्योंकि इससे निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। इसके बाद श्रीकृष्ण विदुर जी के घर गए। वहां न कोई भव्य व्यवस्था थी, न राजसी ठाठ-बाट, लेकिन वहां सच्चा प्रेम और आदर था। विदुर ने अत्यंत सादगी से भगवान को भोजन कराया और श्रीकृष्ण ने उसी को स्वीकार किया, क्योंकि वहां भावनात्मक शुद्धता और स्नेह था।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, बाहरी वैभव से अधिक महत्वपूर्ण आंतरिक भावना होती है। जहां प्रेम और सत्य होता है, वहां साधारण भोजन भी अमृत समान हो जाता है और जहां अहंकार, अधर्म और असत्य होता है, वहां का सबसे अच्छे व्यंजन भी स्वीकार नहीं करना चाहिए।

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