धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—955

पुराने समय में एक वन में एक मंदिर बन रहा था। मंदिर में लकड़ी का काम अधिक होने से कई बढ़ई दिन-रात काम कर रहे थे। परिसर में जगह-जगह लकड़ी के बड़े-बड़े लट्ठे, आरी और अन्य औजार रखे थे। दोपहर के भोजन के समय सभी मजदूर एक घंटे के लिए शहर चले जाते थे। एक दिन भोजन के लिए जाने से पहले एक मजदूर ने एक बड़े लट्ठे को आधा चीरकर उसके बीच में लोहे का कीला फंसा दिया, ताकि लौटने पर उसी जगह से आरी आसानी से चल सके।

मजदूरों के जाते ही बंदरों का एक झुंड वहां आ पहुंच गया। वे इधर-उधर उछल-कूद करने लगे। उनके साथ एक बेहद शरारती बंदर भी था, जिसकी आदत हर चीज को बिगाड़ने की थी। बंदरों का सरदार बूढ़ा और अनुभवी था। उसने सभी को स्पष्ट चेतावनी दी कि किसी भी औजार से या किसी भी चीज से यहां कोई छेड़छाड़ न करें। सभी बंदर पेड़ों की ओर चले गए, लेकिन वह शरारती बंदर चुपके से उसी जगह रुक गया।

उछल-कूद करते समय शरारती बंदर की नजर आधे चिरे हुए लट्ठे पर पड़ी। पहले उसने पास रखी आरी उठाई और लकड़ी पर चलाने की कोशिश की। आरी से तेज आवाज निकली तो उसने झुंझलाकर उसे फेंक दिया। अब उसकी उत्सुकता लट्ठे के बीच फंसे कीले पर टिक गई। वह सोचने लगा कि अगर इस कीले को बाहर निकाल दिया जाए तो क्या होगा।

अब उस बंदर ने पूरी ताकत से कीले को हिलाना शुरू किया। काफी कोशिश के बाद कीला धीरे-धीरे खिसकने लगा। किले को हिलता देखकर उस बंदर को अपनी सफलता पर अहंकार होने लगा, उसने और जोर लगाया, लेकिन उसे पता ही नहीं चला कि उसकी पीठ के पीछे उसकी पूंछ लट्ठे के दो हिस्सों के बीच में आ गई है।

बंदर ने पूरी ताकत लगाकर एक जोरदार झटका दिया और कीला बाहर निकल गया, लट्ठे के दोनों हिस्से तेजी से आपस में बंद हो गए और उस बंदर की पूंछ बीच में ही फंस गई। अब वह दर्द से वह जोर-जोर से चीखने लगा।

उसी समय मजदूर वापस लौट आए। उन्हें देखकर बंदर डर गया और भागने की कोशिश करने लगा। उसने पूरी ताकत लगाई, जिससे उसकी पूंछ टूट गई। वह दर्द और पछतावे के साथ वहां से भाग निकला।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जिज्ञासा अच्छी बात है, लेकिन विवेक के साथ काम करें – नई चीजें सीखने की इच्छा सकारात्मक बात है, लेकिन बिना ज्ञान और तैयारी के काम करना जोखिम भरा हो सकता है। पहले समझें, फिर आगे कदम उठाएं।

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