धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 688

वाराणसी के घाट पर एक संत प्रतिदिन ध्यान में बैठा करते थे। एक दिन एक युवक आया, जिसने सिर से पांव तक गीले वस्त्र पहन रखे थे। वह गर्व से बोला, “बाबा! आज मैंने गंगा में स्नान कर लिया। अब मेरे सारे पाप धुल गए होंगे।”

संत मुस्कुराए और बोले, “बेटा, बहुत अच्छा किया। पर एक प्रश्न का उत्तर देना — जब तुम नदी में गए थे, तब क्या तुम्हारे मन में अपने किए बुरे कर्मों के लिए पश्चाताप था?”

युवक ने हँसते हुए कहा, “पश्चाताप की क्या जरूरत बाबा? गंगा तो अपने आप सब कुछ धो देती है।”

संत ने पास ही पड़ी एक रस्सी उठाई, उसे नदी के किनारे ले जाकर उसमें मिट्टी का लोटा बाँधा और बोले, “देखो, यह लोटा अब गंगा में जाएगा।” उन्होंने लोटा नदी में डुबो दिया और कुछ देर बाद बाहर निकाला। लोटे के ऊपर का हिस्सा गीला था, लेकिन अंदर से वही सूखा रहा।

संत ने कहा, “बेटा, देखो — यह लोटा तुम्हारे जैसा है। बाहर से गंगा का जल छू गया, पर अंदर का मैल ज्यों का त्यों है। जब तक भीतर का मन पवित्र नहीं होगा, तब तक बाहरी स्नान किसी काम का नहीं। गंगा का जल केवल शरीर को स्वच्छ करता है, आत्मा को नहीं।”

युवक कुछ सोच में पड़ गया। संत आगे बोले, “गंगा में नहाने से पाप तभी नष्ट होते हैं, जब मन में सच्चा पश्चाताप हो, हृदय में परिवर्तन की भावना हो और आगे कभी वही गलती न दोहराने का संकल्प हो। अन्यथा पाप तो किनारे पर बैठकर फिर से गले लगने की प्रतीक्षा करता है।”

युवक की आंखों से आँसू बह निकले। उसने संत के चरणों में सिर झुका दिया और बोला, “अब समझ गया बाबा — गंगा में नहाना नहीं, मन को धोना जरूरी है।”

संत मुस्कुराए, “यही सच्चा स्नान है, बेटा। गंगा बाहर बहती है, पर असली गंगा तो भीतर बहती है — जब मन निर्मल हो जाता है।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, बाहरी पूजा या स्नान से नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता, सच्चे पश्चाताप और अच्छे कर्मों से ही पाप नष्ट होते हैं।

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