धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—807

एक बार की बात है, एक घने जंगल में ऋषि श्रद्धानंद का आश्रम था। उनके पास सुधीर नाम का एक युवक आया। सुधीर बहुत परेशान था। वह एक बड़े व्यापारी का बेटा था, लेकिन हमेशा डरा हुआ रहता था।

सुधीर ने ऋषि के चरण छुए और अपनी समस्या बताई: “गुरुवर, मेरे पास धन-दौलत, परिवार, सब कुछ है। लेकिन मुझे हमेशा एक डर सताता रहता है। मुझे लगता है कि अगर कल मेरा व्यापार डूब गया, या मेरे पिता का साया मेरे सिर से उठ गया, या मेरे दोस्तों ने साथ छोड़ दिया, तो मेरा क्या होगा? मुझे लगता है कि मैं जिस ज़मीन पर खड़ा हूँ, वो कभी भी खिसक सकती है।”

ऋषि श्रद्धानंद उसकी मनस्थिति समझ गए। वह जानते थे कि सुधीर अपनी खुशी और सुरक्षा के लिए बाहरी चीजों पर निर्भर है।

शाम का समय था और तेज़ हवा चल रही थी। ऋषि उसे आश्रम के बगीचे में एक पुराने बरगद के पेड़ के पास ले गए।

उन्होंने ऊपर इशारा किया। पेड़ की एक बहुत ही पतली और सूखी टहनी पर एक छोटी सी चिड़िया बैठी थी। हवा के तेज़ झोंकों से वह टहनी बुरी तरह हिल रही थी। कभी ऊपर, कभी नीचे। ऐसा लग रहा था कि टहनी अब टूटी कि तब टूटी।

ऋषि ने सुधीर से पूछा, “बेटा, उस चिड़िया को देखो। जिस डाल पर वह बैठी है, वह कितनी कमज़ोर है। हवा उसे डरा रही है। क्या तुम्हें लगता है कि वह चिड़िया डरी हुई है?”

सुधीर ने ध्यान से देखा। चिड़िया मजे से बैठी थी, चहचहा रही थी और अपने पंख संवार रही थी। उसे टहनी के टूटने का ज़रा भी खौफ नहीं था।

सुधीर ने कहा, “नहीं गुरुवर, वह तो बिल्कुल शांत है। शायद उसे पता नहीं है कि डाल टूटने वाली है।”

तभी हवा का एक ज़बरदस्त झोंका आया और कड़क! की आवाज़ के साथ वह सूखी डाल टूटकर नीचे गिरने लगी।

लेकिन चिड़िया नीचे नहीं गिरी।

डाल के ज़मीन पर गिरने से पहले ही चिड़िया ने अपने पंख खोले और हवा को चीरती हुई आकाश में उड़ गई। वह पास की दूसरी मज़बूत डाल पर जाकर बैठ गई।

ऋषि श्रद्धानंद ने सुधीर के कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए बोले: “बेटा, तुमने देखा? वह चिड़िया इसलिए नहीं डरी थी कि डाल मज़बूत थी। उसे पता था कि डाल कमज़ोर है। वह इसलिए निडर थी क्योंकि उसका भरोसा उस लकड़ी की डाल पर नहीं, बल्कि अपने पंखों पर था।”

उन्होंने सुधीर को जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया: “सुधीर, तुम अपने व्यापार, अपने पिता की संपत्ति और दोस्तों के सहारे को उस ‘कमज़ोर डाल’ की तरह पकड़े बैठे हो। इसलिए तुम डरते हो कि अगर ये टूट गए तो तुम गिर जाओगे। जिस दिन तुम्हें अपनी खुद की काबिलियत और अपने ‘पंखों’ पर भरोसा हो जाएगा, उस दिन डाल हिले या टूट जाए, तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा।”

सुधीर को अपनी गलती समझ आ गई। उसने समझ लिया कि बाहरी सहारा कितना भी मज़बूत क्यों न हो, एक दिन टूट सकता है, लेकिन अपना हुनर और आत्मविश्वास ही वह पंख हैं जो हर मुसीबत में उड़ान भरने में मदद करते हैं।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, दूसरों के भरोसे या किस्मत के भरोसे जीने वाले हमेशा डरे रहते हैं।नौकरी, पैसा या रिश्ता—ये सब बाहरी ‘डाल’ हैं। ये कभी भी हिल सकते हैं। असली सुरक्षा बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि इस विश्वास में है कि “अगर सब कुछ लुट भी गया, तो मैं अपनी मेहनत से दोबारा सब कुछ खड़ा कर लूँगा।”

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