धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से-804

एक समय की बात है, विजय नाम का एक महान सेनापति था। उसने अपने राज्य के लिए कई युद्ध लड़े और जीते। लेकिन अंतिम युद्ध में उसे चेहरे पर तलवार का एक गहरा घाव लगा। घाव तो भर गया, लेकिन उसके चेहरे पर एक लंबा और डरावना निशान रह गया।

विजय को अपने इस चेहरे से नफरत हो गई। उसे लगता था कि अब वह कुरूप दिखता है। वह जब भी किसी समारोह में जाता, अपने आधे चेहरे को कपड़े से ढक कर रखता ताकि कोई उसका वह “दाग” न देख सके। धीरे-धीरे उसने लोगों से मिलना-जुलना बंद कर दिया और एकांत में रहने लगा।

एक दिन उसके राज्य में एक तेजस्वी संत पधारे। राजा ने विजय को संत की सेवा और सुरक्षा की जिम्मेदारी दी।

विजय, संत के साथ चल रहा था, लेकिन उसका चेहरा हमेशा की तरह कपड़े से ढका हुआ था। संत ने कुछ देर उसे देखा और फिर पूछा: “वत्स! तुम वीर सेनापति हो, फिर तुमने अपना चेहरा किसी अपराधी या कायर की तरह क्यों छुपा रखा है?”

विजय ने उदास होकर कहा, “महात्मन, युद्ध में मुझे यह भयानक घाव लगा था। इसका निशान इतना बदसूरत है कि लोग इसे देखकर डर जाएंगे या घृणा करेंगे। यह निशान मेरी सुंदरता पर एक बदनुमा दाग है।”

संत कुछ नहीं बोले। वे उसे एक शस्त्रगार में ले गए जहाँ पुरानी और नई तलवारें रखी थीं।

संत ने वहां से दो तलवारें उठाईं।

पहली तलवार: एकदम नई, चमचमाती हुई, बिना किसी खरोंच के।

दूसरी तलवार: जिसकी धार जगह-जगह से मुड़ी हुई थी और उस पर सैकड़ों खरोंचें थीं।

संत ने विजय से पूछा, “वत्स, अगर तुम्हें अभी युद्ध पर जाना हो, तो तुम इन दोनों में से कौन सी तलवार चुनोगे?”

विजय ने तुरंत दूसरी (खरोंच वाली) तलवार उठाई और कहा, “महाराज, मैं यह दूसरी वाली चुनूंगा।”

संत ने पूछा, “क्यों? यह तो जगह-जगह से टूटी और बदसूरत है, जबकि पहली वाली एकदम बेदाग है।”

विजय ने गर्व से कहा, “महाराज, यह नई तलवार सिर्फ दिखने में सुंदर है, लेकिन इसकी परीक्षा नहीं हुई है। पता नहीं युद्ध में यह साथ देगी या टूट जाएगी। लेकिन यह दूसरी तलवार… इसकी खरोंचें बताती हैं कि इसने सैकड़ों युद्ध देखे हैं, इसने लोहे को काटा है। यह विश्वसनीय है। इसके दाग इसकी मजबूती का सबूत हैं।”

संत जोर से हंसे और विजय के चेहरे से कपड़ा हटाते हुए बोले: “मूर्ख! तुम तलवार के बारे में तो सब समझते हो, लेकिन खुद को नहीं पहचान पाए? जैसे तलवार पर लगी खरोंचें बताती हैं कि वह ‘योद्धा’ है, वैसे ही तुम्हारे चेहरे का यह दाग बताता है कि तुम मुसीबतों से भागने वाले कायर नहीं, बल्कि उनसे लड़ने वाले शूरवीर हो।”

उन्होंने आगे कहा: “यह दाग तुम्हारी कुरूपता नहीं, तुम्हारा ‘मेडल’ है। बेदाग तो वो होते हैं जो कभी घर से निकले ही नहीं। तुम्हारे दाग इस बात के गवाह हैं कि तुमने संघर्ष किया और तुम जिंदा बच गए।”

विजय की आँखों से पर्दा हट गया। उसे समझ आ गया कि उसका निशान शर्मिंदगी का विषय नहीं, बल्कि गर्व का प्रतीक है। उस दिन के बाद उसने कभी अपना चेहरा नहीं ढका।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जीवन में मिली असफलताएं, धोखे या चोट के निशान (चाहे शरीर पर हों या मन पर) यह बताते हैं कि आपने जीवन को सिर्फ जिया नहीं, बल्कि उसे ‘झेला’ और ‘जीता’ है।

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