एक बार एक प्रसिद्ध पहलवान, जिसका नाम भीम था, एक बड़ी कुश्ती प्रतियोगिता में बुरी तरह हार गया। वह अपने गाँव का सबसे ताकतवर आदमी था, लेकिन उस हार ने उसे अंदर से तोड़ दिया। उसे लगने लगा कि अब उसका दौर खत्म हो गया है। वह उदास रहने लगा और उसने कुश्ती का अभ्यास भी छोड़ दिया।
भीम के गुरु से उसकी यह दशा देखी। वे समझ गए कि भीम मैदान में तो हार गया है, लेकिन अब वह ‘मन’ से भी हार रहा है, जो ज्यादा खतरनाक है।
एक शाम, स्वामी जी भीम को लेकर पास के एक गाँव के मेले में गए। वहां एक महावत अपने विशालकाय हाथी के साथ खड़ा था।
हाथी बहुत ताकतवर था, लेकिन वह एक बहुत ही पतली और कमजोर रस्सी से एक छोटे से खूंटे से बंधा हुआ था। हाथी आराम से खड़ा था, उसने रस्सी तोड़ने की कोई कोशिश नहीं की।
भीम ने यह देखा और हैरान होकर स्वामी जी से पूछा: “गुरुजी, यह हाथी इतना विशाल है कि एक झटके में बड़े-बड़े पेड़ उखाड़ सकता है। फिर यह इतनी पतली रस्सी से बंधा हुआ चुपचाप क्यों खड़ा है? यह इसे तोड़कर भाग क्यों नहीं जाता?”
स्वामी जी मुस्कुराए और बोले: “बेटा, इसका जवाब मैं नहीं, यह महावत देगा।”
उन्होंने महावत से पूछा। महावत ने हँसते हुए कहा: “महाराज, जब यह हाथी बहुत छोटा और कमजोर बच्चा था, तब मैंने इसे इसी रस्सी से बांधा था। उस समय इसने इस रस्सी को तोड़ने की बहुत कोशिश की थी, हजारों बार जोर लगाया, लेकिन तब यह कमजोर था और रस्सी मजबूत थी। यह तोड़ नहीं पाया।”
महावत ने आगे कहा: “धीरे-धीरे इसे विश्वास हो गया कि यह रस्सी कभी नहीं टूटेगी। अब यह बड़ा और शक्तिशाली हो गया है, लेकिन इसके दिमाग (मन) में अब भी वही बचपन की हार बैठी हुई है। इसे लगता है कि यह रस्सी नहीं तोड़ सकता, इसलिए अब यह कोशिश ही नहीं करता।”
स्वामी जी ने भीम की आँखों में झाँका और कहा: “भीम, तुम इस हाथी की तरह हो। तुम मैदान में एक बार हारे (जैसे यह बचपन में हारा था), लेकिन तुमने उस एक हार को अपने मन की बेड़ी बना लिया है। आज तुम्हारे पास अनुभव है, ताकत है, लेकिन तुम्हारा ‘मन’ मान चुका है कि तुम जीत नहीं सकते।”
स्वामी जी ने फिर वह बात कही जो जीवन बदल देती है: “मैदान में हारा हुआ इंसान फिर से जीत सकता है, क्योंकि उसकी ताकत उसके शरीर में होती है। लेकिन मन से हारा हुआ इंसान कभी नहीं जीत सकता, क्योंकि उसकी कमजोरी उसके विश्वास में होती है।”
भीम को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने देखा कि उसकी असली रुकावट उसका विरोधी नहीं, बल्कि उसका अपना डर था। उसने उसी वक्त उस मानसिक रस्सी को तोड़ दिया। उसने दोबारा अभ्यास शुरू किया और अगले साल वही प्रतियोगिता जीतकर वह चैंपियन बना।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, हम अक्सर पिछली असफलताओं के आधार पर मान लेते हैं कि हम “यह नहीं कर सकते”। यह सिर्फ एक भ्रम है। परिस्थितियां बदलती हैं। कल जो काम आपसे नहीं हुआ, हो सकता है आज आप उसे करने में सक्षम हों, क्योंकि आज आप पहले से ज्यादा समझदार और ताकतवर हैं। अगर आप मन में ठान लें कि “मैं कर सकता हूँ”, तो आधी लड़ाई आप वहीं जीत जाते हैं।








