गंगे किनारे बसे एक छोटे से गाँव में आचार्य वसिष्ठ नाम के एक संत रहते थे। उनके आश्रम में दूर-दूर से लोग ज्ञान लेने आते थे। पास ही एक और व्यक्ति रहता था—राघव, जो अपने आप को बड़ा धार्मिक बताता था। माथे पर लंबा तिलक, गले में कई मालाएँ, और हाथ में डंडा… गाँव में वह ऐसे चलता जैसे वही धर्म का रक्षक हो। पर भीतर से उसका व्यवहार कठोर था—गरीबों को डाँटना, पशुओं को मारना, छोटे बच्चों को कोसना—यह सब उसकी आदत थी।
एक बार गाँव में भारी गर्मी पड़ी। नदी सूखने लगी। लोगों को दूर-दूर से पानी लाना पड़ता था।
आचार्य वसिष्ठ ने कहा— “जो भी जल चाहे, आश्रम के कुएँ से ले जाए। पानी सबका है।”
लोग वहाँ से पानी भरने लगे। पर राघव को यह बात अच्छी नहीं लगी। वह बोला— “धर्म कहता है कि पहले रोजाना कुएं की पूजा होगी, फिर जल बाँटा जाएगा! बिना मंत्र जल बाँट देना पाप है!”
एक गरीब विधवा अपना घड़ा लेकर पानी भरने आई। राघव ने उसे धक्का देकर कहा— “रुको! पहले पूजा होगी, अभी कुएं की पूजा नहीं हुई है, इसलिए जल नहीं मिलेगा।”
उसकी बात सुनकर आचार्य वसिष्ठ शांत मुस्कुराए और बोले— “राघव, मैं तुमसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ। यदि कोई व्यक्ति प्यास से मर रहा हो, तो क्या ईश्वर उससे पहले मंत्र जप करवाएगा, फिर पानी देगा?”
राघव कुछ बोल न सका।
आचार्य आगे बोले— “धर्म वह है, जिससे किसी का कल्याण हो। और पाखंड वह है, जिससे किसी को कष्ट हो, पर करने वाला खुद को धार्मिक दिखाए। जिस ‘धर्म’ से प्रेम कम हो और अहंकार बढ़े—वह धर्म नहीं, पाखंड है।”
फिर उन्होंने उस विधवा को पानी भरने दिया और अपने हाथों से उसका घड़ा उठाकर दिया।
गाँव वालों ने पहली बार धर्म और पाखंड का असली अंतर अपनी आँखों से देखा।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, “धर्म लोगों को जोड़ता है,पाखंड लोगों को तोड़ता है। धर्म सेवा है,पाखंड दिखावा।” तिलक बड़ा करने से नहीं, दिल बड़ा करने से धर्म जीवित रहता है।








