एक बार एक जिज्ञासु ने एक संत से पूछा, “महाराज, परमात्मा से बिछड़ने का दुःख इतना कष्टकारी क्यों है? क्या इस पीड़ा के बिना भी उन्हें पाया जा सकता है?”
संत ने मुस्कुराते हुए पास ही जल रहे चूल्हे की ओर इशारा किया और कहा, “उस लकड़ी को देखो। जब वह आग में जलती है, तो उससे पानी की बूंदें बाहर निकलती हैं और वह आवाज़ करती है। क्या तुम जानते हो वह क्यों रो रही है?”
जिज्ञासु मौन रहा। संत ने समझाया: “जब लकड़ी हरी होती है, तो उसमें मोह (नमी) होता है। आग उसे जलाकर उसकी नमी को बाहर निकालती है। वह पीड़ादायक है, लेकिन जैसे ही नमी पूरी तरह खत्म हो जाती है, वह लकड़ी स्वयं आग का रूप ले लेती है। वैसे ही, वियोग की पीड़ा हमारे भीतर के ‘अहंकार’ और ‘मोह’ की नमी को सुखाती है।”
उन्होंने कहा— संत कबीर ने वियोग को एक ‘साँप’ की तरह बताया है जो शरीर के भीतर बैठा है:
“बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।”
अर्थात, विरह का सर्प जब शरीर के अंदर डसता है, तो संसार का कोई मंत्र या औषधि काम नहीं आती। केवल प्रियतम (ईश्वर) का दर्शन ही उसका उपचार है।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, वियोग की पीड़ा कोई सजा नहीं है, बल्कि यह प्रेम की गहराई का प्रमाण है। जिसे खोने का डर या विरह नहीं, उससे प्रेम कैसा? यह पीड़ा भक्त को संकुचित ‘स्व’ से निकालकर अनंत ‘परमात्मा’ में विलीन कर देती है।








