धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 815

एक समय की बात है, एक प्रतापी राजा का राज्य एक शक्तिशाली दुश्मन देश द्वारा घेर लिया गया था। दुश्मन की सेना विशाल थी और राजा की सेना बहुत छोटी। राजा के सेनापति और सैनिक बुरी तरह डरे हुए थे। उन्हें विश्वास हो गया था कि उनकी हार निश्चित है।

राजा घबराकर अपने गुरु, एक सिद्ध संत के पास गया और बोला, “महाराज, मेरे सैनिक युद्ध शुरू होने से पहले ही हार मान चुके हैं। वे कहते हैं कि इतनी बड़ी सेना से लड़ना आत्महत्या है। अब क्या होगा?”

संत ने शांत भाव से कहा, “राजन, सेनापति को विश्राम पर भेज दो और आज से इस युद्ध का नेतृत्व मैं करूँगा।”

सैनिकों को जब पता चला कि एक निहत्थे संत उनका नेतृत्व करेंगे, तो वे और भी डर गए। रास्ते में एक पुराना मंदिर पड़ा। संत वहां रुके और सभी सैनिकों से कहा: “मैं मंदिर के भीतर जाकर भगवान से पूछूंगा कि हमारी जीत होगी या नहीं। मैं बाहर आकर एक सिक्का उछालूँगा। अगर ‘चित’ आया तो समझो भगवान हमारे साथ हैं और हमारी जीत पक्की है। अगर ‘पट’ आया, तो हम लौट जाएंगे।”

संत मंदिर से बाहर आए और पूरी सेना के सामने सिक्का उछाला। सिक्का गिरा और ‘चित’ आया।

सिक्का देखते ही सैनिकों में बिजली सी दौड़ गई। उन्हें लगा कि जब स्वयं ईश्वर ने कह दिया है कि हम जीतेंगे, तो हमें कोई नहीं हरा सकता। जो सैनिक अब तक हताश थे, वे अब शेर की तरह दहाड़ने लगे।

युद्ध शुरू हुआ। मुट्ठी भर सैनिकों ने अपनी पूरी ताकत और अटूट विश्वास के साथ दुश्मन की विशाल सेना पर हमला किया। वे इस कदर लड़े कि दुश्मन सेना के पैर उखड़ गए और राजा की जीत हुई।

वापस लौटते समय सैनिक उसी मंदिर पर रुके। सेनापति ने गर्व से कहा, “महाराज, देखिए भगवान ने हमारा साथ दिया और हम जीत गए।”

संत ने मुस्कुराते हुए अपनी जेब से वह सिक्का निकाला और सेनापति के हाथ में थमा दिया। सेनापति के होश उड़ गए जब उसने देखा कि सिक्के के दोनों तरफ ‘चित’ ही था।

संत ने गंभीर स्वर में कहा: “तुम्हें क्या लगा कि सिक्के ने तुम्हें जिताया? नहीं! तुम इसलिए जीते क्योंकि तुमने ‘मान लिया’ था कि तुम जीतोगे। तुम्हारी हार तब तक नहीं हुई थी जब तक तुम डर रहे थे, और तुम्हारी जीत तब तक नहीं हुई जब तक तुमने मन में जीत का संकल्प नहीं किया। असल युद्ध मन में लड़ा गया था।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, परिस्थितियाँ वैसी ही बन जाती हैं जैसा हम उनके बारे में गहराई से विश्वास कर लेते हैं। दुनिया की मुश्किलें आपको केवल परेशान कर सकती हैं, लेकिन आपको ‘हरा’ तभी सकती हैं जब आप भीतर से हथियार डाल दें। यदि मन अडिग है, तो संसाधन कम होने पर भी रास्ते निकल आते हैं।

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