एक गाँव में एक युवा था—नाम था नरेन। कई वर्षों से व्यापार में नुकसान, घर में कलह और मन में निराशा। बार-बार प्रयास करता, पर हर बार असफलता उसके मन की दीवारों को थोड़ा और गिरा देती। एक दिन वह इतना टूट गया कि जंगल में रहने वाले एक ज्ञानी संत के पास पहुँचा।
नरेन बोला, “गुरुदेव, मैंने सब कर लिया… अब मुझसे नहीं होता। शायद मेरे जीवन में कुछ अच्छा होना लिखा ही नहीं। क्या करूँ?”
संत मुस्कराए। उन्होंने उसे एक छोटी-सी मिट्टी की दीया थमा दी और कहा, “इसे जला दो। और जब तक यह जला हुआ है, तुम बस एक ही बात मन में रखना— ‘बस उम्मीद मत छोड़ना, जरूर बेहतरीन होगा।’”
नरेन ने दीया जलाया। बाहर हवा चल रही थी, लौ बार-बार डगमगाती, पर बुझती नहीं। वह उसे बचाता रहा। कुछ समय बाद संत बोले, “देखो, यह छोटी-सी लौ कितनी बार हिली, लेकिन बुझी नहीं। क्यों? क्योंकि तुमने इसे बचाया, इसे संभाला, इसे जीवित रखा। तुमने उम्मीद निभाई।”
फिर संत ने जमीन पर रखी एक सूखी डाल उठाई और कहा, “जब पूरी डाल सूख जाती है, तब भी भीतर एक बिंदु जीवन बाकी रहता है। वही बिंदु वसंत आने पर हरी पत्ती उगाता है। मनुष्य भी ऐसा ही है—समय चाहे कितना ही कठोर क्यों न हो, जब तक उम्मीद जीवित है, बेहतरीन भविष्य जन्म लेता है।”
नरेन की आँखों में चमक आ गई। वह समझ गया कि असफलता अंत नहीं, परीक्षा है। उसने संत के चरण छुए और नए संकल्प के साथ गाँव लौट आया। धीरे-धीरे वह अपना काम फिर से खड़ा करने लगा। पहले एक छोटा अवसर मिला, फिर दूसरा—और कुछ ही महीनों में काम इतना बढ़ा कि लोग उससे सलाह लेने आने लगे।
एक दिन वही नरेन संत से मिलने लौटा और बोला, “गुरुदेव, आपकी एक पंक्ति ने मेरा जीवन बदल दिया— ‘बस उम्मीद मत छोड़ना, जरूर बेहतरीन होगा।’”
संत मुस्कराए और बोले, “बेटा, उम्मीद वह दीपक है जो सबसे अंधेरी रात में भी रास्ता दिखा देता है। बस उसे बुझने मत देना।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, उम्मीद कभी छोटी नहीं होती। वह वही शक्ति है जो डगमगाई हुई लौ को भी उजाला बनने देती है। जब तक मन में उम्मीद है, तब तक हर कठिनाई के बाद एक बेहतरीन सुबह जरूर होती है।








