धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—840

पुराने समय की बात है, एक गांव में दो संत थे। दोनों एक ही आश्रम में रहते थे और दोनों का जीवन बहुत साधारण था। संतों में से एक का नाम सुखी था और दूसरे का नाम दुखी। संत सुखी हर समय प्रसन्न और संतुष्ट रहता था। वहीं, दुखी संत हमेशा उदास और परेशान दिखता था।

गांव के लोग अपनी समस्याओं और परेशानियों के समाधान पाने के लिए दोनों संतों के पास आते थे। आश्चर्य की बात यह थी कि दोनों संत अपने ज्ञान और अनुभव से लोगों की मदद करते थे। दुखी संत के समाधान भी बहुत अच्छे और प्रभावी होते थे, लेकिन वह स्वयं अपनी समस्याओं से कभी मुक्त नहीं हो पाता था।

एक दिन दुखी संत ने अपने गुरु से प्रश्न किया, “गुरु जी, लोग मेरे चेहरे के हाव-भाव देखकर मुझे ‘दुखी’ कहने लगे हैं। मैं भी रोज पूजा-पाठ करता हूं, सभी कार्य ईमानदारी से करता हूं, लेकिन मेरे जीवन में दुख ही दुख क्यों है? संत सुखी हमेशा खुश रहता है। उसकी तरह मैं क्यों नहीं रह सकता?”

गुरु ने मुस्कुराते हुए कहा, “तुम दोनों का जीवन और कार्य एक जैसे हैं, लेकिन फर्क तुम्हारे विचारों और दृष्टिकोण में है। संत सुखी का मन हमेशा शांत और संतुष्ट रहता है। उसे खुद पर भरोसा है और वह जानता है कि बड़ी से बड़ी समस्याओं का समाधान निकाल सकता है। इसी कारण वह खुश रहता है। जबकि तुम अपने परिणामों को लेकर हमेशा चिंतित रहते हो, कभी संतुष्ट नहीं होते और खुद पर भरोसा नहीं करते। इसलिए तुम दुखी रहते हो।”

दुखी संत को यह समझ में आया कि उसका दुख केवल उसके नकारात्मक विचारों और आत्मविश्वास की कमी की वजह से है। उसने अपनी सोच बदलने का निर्णय लिया। धीरे-धीरे वह अपने मन को शांत रखना और खुद पर भरोसा करना सीख गया। कुछ समय बाद वह भी संत सुखी की तरह खुश और संतुष्ट रहने लगा।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, मन की शांति, सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास ही जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति हैं। अगर हम अपने मन को शांत रखें और खुद पर विश्वास करें, तो बड़ी से बड़ी परेशानियों को भी हल किया जा सकता है।

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Jeewan Aadhar Editor Desk