एक बार एक युवक संत के पास पहुँचा और बोला, “गुरुदेव, दिन भर मैं बहुत भागता-दौड़ता हूँ, पर कोई काम ठीक से हो नहीं पाता। मन बिखरा-बिखरा रहता है। मैं क्या करूँ?”
संत मुस्कुराए और उसे अपने आश्रम के तालाब के पास ले गए।
सुबह का समय था—हल्की-हल्की किरणें पानी पर पड़ रही थीं। पक्षियों की चहचहाहट वातावरण को शांत कर रही थी।
संत बोले, “बेटा, क्या तुम्हें पता है कि प्रकृति अपनी सबसे शुद्ध ऊर्जा कब देती है?”
युवक बोला, “शायद भोर में?”
संत ने सिर हिलाया, “हाँ, भोर का समय केवल सूर्योदय नहीं होता। यह वह घड़ी है जब मन अपनी सर्वोच्च क्षमता में होता है— शांत, निर्मल, जागृत और ग्रहणशील। जैसे यह जल सुबह शांत होता है, वैसे ही मन भी भोर में साफ होता है। इसी समय की योजना पूरा दिन दिशा दे सकती है।”
फिर संत ने युवक को एक कटोरी दी और कहा, “इसे पानी से भरकर ले आओ।”
युवक गया, लेकिन थोड़ी देर बाद कटोरा पानी से छलक रहा था और उसके कदम लड़खड़ा रहे थे।
संत ने पूछा, “क्या हुआ? पानी क्यों छलक गया?”
युवक बोला, “गुरुदेव, राह में लोग चल रहे थे, आवाज़ें थीं, ध्यान भटक गया। इसलिए कटोरा स्थिर नहीं रहा।”
संत मुस्कुराए और बोले, “यही तुम्हारा उत्तर है। दिन के समय शोर, गतिविधियाँ, चिंताएँ, फोन, काम— ये सब मन को विचलित करते हैं। तुम कितनी भी कोशिश करो, मन उतना स्थिर नहीं रह सकता। लेकिन भोर का समय— जब सब शांत होता है, मन निर्मल होता है— तभी तुम्हारी योजना भी स्थिर और सफल बनती है।”
संत ने अंत में कहा, “जो व्यक्ति अपनी सुबह जीत लेता है, वह दिन जीत लेता है। और जो दिन जीत लेता है, वह जीवन जीत लेता है।”
युवक ने यह बात हृदय में उतार ली और अगले दिन से अपनी सारी महत्वपूर्ण योजनाएँ, निर्णय और लक्ष्य सुबह बैठकर बनाने लगा।
धीरे-धीरे उसका जीवन बदलने लगा— कार्य भी सफल होने लगे और मन भी प्रसन्न रहने लगा।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, भोर का समय ऊर्जा, उत्साह, उमंग और चेतना से भरा होता है; महत्वपूर्ण योजना सुबह तैयार करें, क्योंकि सुबह बनाई गई योजना ही जीवन की दिशा तय करती है।








