धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 780

बहुत समय पहले गुरुदेव मंगलदास जी हरियाणा में धर्मप्रचार के लिए आए हुए थे। वे सादगी और करुणा के लिए जाने जाते थे। इस दौरान लोहड़ी का पर्व आया, चारों तरफ लोहड़ी की रौनक बढ़ गई— लोहड़ी के आते ही ढोल बजते, अलाव जलते, लोग गीत गाते, रेवड़ी, मूंगफली और गजक बाँटते।

लोहड़ी का दिन आया। पूरा गाँव रंग-बिरंगी रोशनी और आग की लपटों से जगमगा उठा। हर गली में अलाव था, हर चेहरे पर मुस्कान। पर गुरुदेव मंगलदास जी न तो नए वस्त्रों में थे, न उत्सव में शामिल। वे अपने ध्यान में चुपचाप बैठे थे।

एक युवा ने आकर पूछा, “गुरुदेव जी, आज लोहड़ी है। आप ही तो हमें पर्वों का महत्व समझाते हैं, फिर आज आप उत्सव से दूर क्यों हैं?”

गुरुदेव ने शांत स्वर में कहा, “पुत्र, पर्व तभी पूर्ण होता है जब उसका प्रकाश किसी अंधेरे जीवन तक पहुँचे।”

इतना कहकर गुरुदेव बाहर आए। थोड़ी ही दूर पर उन्होंने देखा—एक विधवा स्त्री अपने दो छोटे बच्चों के साथ ठिठुरती खड़ी थी। उसके पास न गर्म कपड़े थे, न पेट भर भोजन। गाँव के अलावों की गर्मी वहाँ तक नहीं पहुँच रही थी।

गुरुदेव जी ने उसे अपने पास बुलाया। उन्होंने अपने लिए रखा कंबल उस स्त्री को दे दिया, बच्चों को गुड़ और रोटियाँ दीं और उन्हें अलाव के पास बैठाया। बच्चों के चेहरे पर पहली बार मुस्कान लौटी।

गाँव के लोग यह दृश्य देखकर ठहर गए। ढोल की आवाज धीमी हो गई, गीत रुक गए। गुरुदेव ने तब कहा— “देखो, लोहड़ी की आग अगर केवल दिखावे की है तो वह राख बन जाएगी, पर अगर यह किसी असहाय के जीवन में ऊष्मा बन जाए, तो वही सच्ची पूजा है।”

लोगों को समझ आ गया कि वे पर्व तो मना रहे थे, पर उद्देश्य भूल गए थे। उसी रात गाँव के हर अलाव के पास गरीबों को बुलाया गया, कंबल बाँटे गए, भोजन कराया गया।

गुरुदेव मंगलदास जी ने अंत में कहा— “लोहड़ी हमें सिखाती है कि अपने सुख की अग्नि में किसी दुखी की ठंडक जला दो, यही पर्व का सार है।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, लोहड़ी मनाने का सार्थक परिणाम तभी मिलता है, जब हमारी आग किसी असहाय को गर्मी दे,हमारा अन्न किसी भूखे को तृप्त करे,और हमारा हृदय किसी टूटे मन को सहारा दे। मानव जीवन का ये सार—तुम सेवा से पाओगे पार।

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