एक बार एक सिद्ध संत अपने एक शिष्य के साथ तीर्थयात्रा पर निकले। चलते-चलते शाम हो गई और वे एक गाँव में पहुँचे। उन्होंने सोचा कि रात यहीं बिता ली जाए।
सबसे पहले वे गाँव के सबसे अमीर आदमी के घर गए और रात भर रुकने के लिए आश्रय माँगा। वह अमीर आदमी बहुत ही अहंकारी और क्रूर था। उसने संतों का अपमान किया, उन्हें बुरा-भला कहा और अपने घर से धक्के मारकर निकाल दिया।
निराश होकर संत और शिष्य आगे बढ़े। गाँव के किनारे उन्हें एक गरीब किसान की छोटी सी झोपड़ी दिखी। उन्होंने वहाँ जाकर आश्रय माँगा। किसान बहुत ही दयालु और ईश्वर-भक्त था। उसने आदर के साथ संतों का स्वागत किया। घर में खाने के लिए केवल दो रोटियाँ थीं, जो उसने संतों को खिला दीं और खुद भूखा सो गया। उसने संतों को अपनी चारपाई पर सुलाया और खुद ज़मीन पर सो गया।
अगली सुबह जब संत वहाँ से विदा होने लगे, तो उन्होंने उस गरीब किसान को आशीर्वाद दिया— “जाओ, तुम्हारी इकलौती गाय आज मर जाए!” यह सुनकर शिष्य हैरान रह गया, लेकिन वह चुप रहा।
गाँव से बाहर निकलते समय, संत उसी अमीर आदमी के घर के सामने से गुजरे जिसने उनका अपमान किया था। संत ने उसे देखते ही आशीर्वाद दिया— “जाओ, आज घर की खुदाई करते समय तुम्हें सोने की मोहरों से भरा एक घड़ा मिले!”
अब शिष्य से रहा नहीं गया। उसने क्रोधित होकर संत से कहा, “गुरुजी, यह कैसा न्याय है? जिसने हमारा अपमान किया उसे आपने सोने का घड़ा दे दिया, और जिसने भूखे रहकर हमारी सेवा की, उसकी आजीविका का एकमात्र साधन (गाय) छीन लिया! क्या ईश्वर का यही न्याय है?”
संत मुस्कुराए और बोले, “पुत्र, शांत हो जाओ। मैंने किसी को न कोई सजा दी है और न ही कोई इनाम। यह सब उनके अपने कर्मों का ही फल है।”
शिष्य ने पूछा, “वह कैसे?”
संत ने समझाया: “उस अमीर आदमी के पिछले जन्मों के कर्म बहुत अच्छे थे, जिसके कारण आज उसे एक विशाल खजाना मिलने वाला था। लेकिन कल रात उसने संतों का अपमान करके जो घोर पाप किया, उसके उस बुरे कर्म ने उस विशाल खजाने को घटाकर केवल एक ‘सोने के घड़े’ में बदल दिया।”
“दूसरी ओर, उस गरीब किसान के पिछले जन्मों के बुरे कर्मों के कारण, आज उसकी मृत्यु निश्चित थी। काल आज उसके प्राण लेने वाला था। लेकिन कल रात उसने जिस निस्वार्थ भाव से हमारी सेवा की, अपने हिस्से का भोजन हमें दिया, उसके उस महान पुण्य कर्म ने उसकी ‘मृत्यु’ को टाल दिया और उस सजा का प्रभाव कम होकर केवल उसकी ‘गाय की मृत्यु’ तक सीमित रह गया। उसकी जान बच गई।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, भगवान कभी किसी को दुख देने के लिए नहीं बैठे हैं। वे केवल एक न्यायाधीश की तरह हमारे कर्मों का सही फल हमें देते हैं। हमारे आज के अच्छे कर्म हमारे आने वाले बड़े से बड़े संकट को टाल सकते हैं, और आज के बुरे कर्म हमारे मिलने वाले बड़े सौभाग्य को नष्ट कर सकते हैं।








