भिवानी आश्रम में गुरु राधिकादास जी महाराज नित्य की भांति विराजमान थे। मकर संक्रांति का पावन दिन था। सूर्य उत्तरायण होने को था, वातावरण में पवित्रता और आशा की ऊर्जा थी। दूर-दूर से शिष्य तिल, गुड़ और खिचड़ी लेकर आश्रम आ रहे थे। कहीं हवन की तैयारी थी, कहीं दान की चर्चा।
एक युवा शिष्य ने गुरुजी से पूछा, “गुरुदेव, मकर संक्रांति पर सबसे बड़ा पुण्य क्या है—दान, स्नान या पूजा?”
गुरु राधिकादास जी महाराज ने मुस्कराकर कहा,“पुत्र, मकर संक्रांति केवल तिथि नहीं, दिशा परिवर्तन है— सूर्य का ही नहीं, मनुष्य के मन का भी।”
गुरुजी शिष्यों को लेकर आश्रम से पीछे की तरफ निकले। वहां एक गोशाला थी। ठंड में काँपती गायें, कुछ घायल, कुछ भूखी। गुरुजी ने अपने हाथों से उन्हें चारा डलवाया, घावों पर औषधि लगवाई और बोले— “गौ सेवा मकर संक्रांति का पहला अर्थ है। जिस शहर/गांव में गाय भूखी हो, वहाँ सूर्य का पुण्य नहीं ठहरता।”
फिर वे शहर की बस्ती की ओर बढ़े। वहाँ एक वृद्ध मजदूर परिवार मिला—फटे कपड़े, ठंड से सिकुड़े शरीर, चूल्हे में आग नहीं। गुरुजी ने आश्रम से लाई खिचड़ी, तिल-गुड़ और ऊनी वस्त्र उन्हें दिए। बच्चों के सिर पर हाथ रखकर बोले— “मानव सेवा दूसरा अर्थ है। जो मनुष्य की पीड़ा नहीं समझता, उसकी पूजा अधूरी है।”
अंत में गुरुजी शहर के बाहर एक झोपड़ी में पहुँचे, जहाँ एक असहाय युवक बीमारी और गरीबी से टूट चुका था। गुरु राधिकादास जी महाराज ने शिष्यों से कहा— “गरीब उत्थान मकर संक्रांति की आत्मा है। दान नहीं, सहारा दो— ताकि वह फिर अपने पैरों पर खड़ा हो सके।”
शिष्यों ने उस युवक के इलाज, काम और निवास की व्यवस्था की। सूर्य अब पूरी तरह उत्तरायण हो चुका था।
गुरुजी ने अंत में कहा— “जब सूर्य उत्तर की ओर बढ़ता है, तब मनुष्य को भी सेवा की ओर बढ़ना चाहिए। यही मकर संक्रांति का वास्तविक अर्थ है।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, मकर संक्रांति = गौ-सेवा + मानव सेवा + गरीब उत्थान। यही गुरु राधिकादास जी महाराज के जीवन का संदेश था— प्रत्येक खुशी के अवसर पर हमें समाज को देखने दृष्टि बदलनी चाहिए और असहाय की मदद के लिए आगे आना चाहिए।








