गाँव के किनारे एक छोटा-सा घर था। उस घर में रहने वाला बारह साल का आरव अक्सर सोचता था कि उसके पिता इतने सख्त क्यों हैं और माँ इतनी शांत क्यों।
उसके पिता, रघुवीर, रोज सुबह सूरज निकलने से पहले खेत पर चले जाते। गर्मी हो या सर्दी, बरसात हो या आँधी—उन्होंने कभी काम से जी नहीं चुराया। एक दिन आरव ने पूछा,
“पिताजी, आप इतना संघर्ष क्यों करते हैं? थोड़ा आराम भी कर लिया करें।”
रघुवीर मुस्कुराए और बोले, “बेटा, जीवन में जो संघर्ष से नहीं भागता, वही आगे बढ़ता है। कठिनाइयाँ हमें तोड़ने नहीं, मजबूत बनाने आती हैं।”
उधर उसकी माँ, सीता, हर दिन घर के कामों के साथ-साथ उसे छोटी-छोटी बातें सिखाती—
“बड़ों का आदर करना”,
“झूठ से बचना”,
“भूखे को भोजन देना”,
“किसी का दिल न दुखाना।”
एक दिन आरव शहर पढ़ने चला गया। वहाँ उसे नई-नई चुनौतियाँ मिलीं। कभी दोस्त मज़ाक उड़ाते, कभी परीक्षा में असफलता मिलती, कभी गलत संगति का दबाव होता।
ऐसे समय में उसे पिता की आवाज़ याद आती— “संघर्ष से मत डरना।”
और माँ की सीख याद आती— “संस्कार कभी मत छोड़ना।”
धीरे-धीरे आरव ने मेहनत से पढ़ाई की, गलत रास्तों से खुद को बचाया और एक दिन बड़ी कंपनी में नौकरी पा ली। सफलता मिलने के बाद जब वह गाँव लौटा, तो लोगों ने पूछा,
“तुम्हारी सफलता का राज क्या है?”
आरव ने मुस्कुराकर कहा, “पिता से संघर्ष सीखा, माँ से संस्कार। बाकी सब कुछ दुनिया ने सिखा दिया।”
उस दिन उसके माता-पिता की आँखों में गर्व के आँसू थे। और आरव समझ चुका था — जिसके पास संघर्ष की ताकत और संस्कारों की नींव हो, उसे दुनिया की कोई भी आँधी हिला नहीं सकती।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, घर से मिली सीख ही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी होती है।








