धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—787

एक गुरु अपने शिष्य के साथ यात्रा कर रहे थे। रास्ता कठिन था, पहाड़ियां और गहरी खाइयां उनके रास्ते में थीं। यात्रा के दौरान अचानक शिष्य का पैर फिसला और वह खाई की ओर गिरने लगा। जैसे ही वह गिरा, उसने वहीं उग रहे एक बांस को पकड़ लिया।

शिष्य का वजन बांस पर पड़ते ही वह धनुष की तरह झुक गया, लेकिन बांस टूटा नहीं। गुरु तुरंत दौड़े और शिष्य का हाथ पकड़कर उसे सुरक्षित बाहर खींच लाए। बाहर निकलने के बाद गुरु ने शिष्य से पूछा कि क्या तुमने वह बात सुनी जो बांस ने कही थी?

शिष्य ने सिर हिलाते हुए कहा कि नहीं गुरुजी, मुझे पेड़-पौधों की भाषा नहीं आती। आप ही बताइए।

गुरु ने समझाया कि बांस ने तुम्हें जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ सिखाया है। उसने तुम्हारा वजन सहा, झुका लेकिन टूटा नहीं। ये लचीलापन ही उसे संकट से बचाने वाला गुण है। देखो, बांस कितनी आसानी से आंधी में झुक जाता है, लेकिन जमीन में अपनी पकड़ बनाए रखता है। यही हमें भी सीखना चाहिए।

गुरु ने आगे कहा कि जीवन में जब भी मुश्किलें आएं, हमें गुस्सा या हड़बड़ी नहीं करनी चाहिए। विपरीत परिस्थितियों में भी संयम, धैर्य और विनम्रता बनाए रखें। ठीक उसी तरह जैसे बांस तूफान में झुककर भी अपनी जड़ में अडिग रहता है।

शिष्य ने गुरु की बात ध्यान से सुनी और समझा कि मुश्किलें अस्थायी होती हैं। अगर हम धैर्य और लचीलापन बनाए रखें, तो जीवन की किसी भी चुनौती को पार किया जा सकता है।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जीवन में सुख-दुख का आना-जाना स्वाभाविक है। कुछ लोग मुश्किल परिस्थितियों में हिम्मत हार जाते हैं, गुस्सा और निराशा में फंस जाते हैं, जिससे परिस्थितियां और ज्यादा उलझ जाती हैं। कुछ लोग मुश्किलों में भी संयम और विनम्रता बनाए रखते हैं, ऐसे लोग ही जीवन में सफल होते हैं।

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