धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से-786

बहुत समय पहले की बात है। एक समृद्ध और शक्तिशाली राज्य का राजा था। उसके पास धन था, सेना थी, विद्वान मंत्री थे—फिर भी उसके जीवन में अशांति बनी रहती थी। कभी बिना कारण भय, कभी अपयश, कभी रोग, तो कभी अपनों से कलह। राजा को दृढ़ विश्वास हो गया कि उसके ग्रह अत्यंत अशुभ चल रहे हैं।

राजा ने देश-विदेश से प्रसिद्ध ज्योतिषियों और तांत्रिकों को बुलवाया। किसी ने कहा—“राजन, शनि बहुत क्रूर है, लोहे का दान दीजिए।” किसी ने कहा—“राहु-केतु के कारण बाधाएँ हैं, बड़ा यज्ञ कराना होगा।” किसी ने महंगे रत्न पहनने की सलाह दी। राजा ने धन लुटाया, पूजा-पाठ कराया, पर मन की शांति फिर भी दूर रही।

एक दिन राज्य की सीमा से एक मौन साधक गुजर रहा था। उसके चेहरे पर अद्भुत शांति थी। राजा ने उसे दरबार में बुलाया और कहा, “महात्मा, मेरे ग्रह मुझे चैन से जीने नहीं देते। बताइए, कौन-सा उपाय करूँ?”

संत ने राजा को ध्यान से देखा और बोले, “राजन, उपाय बताने से पहले मैं कुछ दिन आपके साथ रहना चाहता हूँ।”

संत राजमहल में ठहर गए। उन्होंने देखा कि राजा छोटी-छोटी बातों पर क्रोधित हो जाता है, सेवकों से कठोर वाणी में बात करता है, आलोचना सहन नहीं कर पाता और सत्ता के मद में कई बार अन्याय कर बैठता है। वह मंदिर में घंटों पूजा करता था, पर बाहर निकलते ही करुणा भूल जाता था।

कुछ दिनों बाद संत ने राजा से कहा, “राजन, आपने कभी सोचा है कि ग्रह आपके जीवन में क्यों अशांत दिखते हैं?”

राजा बोला, “क्योंकि मेरी कुंडली ही खराब है।”

संत मुस्कराए और बोले,“नहीं राजन। ग्रह तो केवल संकेत देते हैं। असली शक्ति आपके आचरण में है। जैसे धूल भरे दर्पण में चेहरा विकृत दिखता है, वैसे ही अशुद्ध आचरण के कारण ग्रह अशुभ प्रतीत होते हैं।”

राजा ने विनम्र होकर पूछा,“तो फिर मैं क्या करूँ?”

संत ने कहा, “आज से यह व्रत लो—क्रोध आए तो मौन साधना, अहंकार आए तो विनम्रता,
लोभ आए तो दान,और भय आए तो सत्य का आश्रय।”

राजा ने इस साधना को अपनाया। उसने कठोर दंड की जगह न्यायपूर्ण निर्णय लेने शुरू किए। दीन-दुखियों की पीड़ा सुनने लगा। सेवकों को सम्मान देने लगा। गलत होने पर क्षमा माँगने में संकोच नहीं किया।

धीरे-धीरे अद्भुत परिवर्तन होने लगे। राज्य में विद्रोह शांत हो गया,व्यापार में स्थिरता आई,राजा का स्वास्थ्य सुधरने लगा,और मन में एक अनजानी शांति बस गई।

एक दिन राजा ने संत से कहा, “महात्मा, लगता है अब मेरे ग्रह अनुकूल हो गए हैं।”

संत ने शांत स्वर में कहा, “राजन, ग्रह कभी शत्रु नहीं होते। जब मनुष्य का आचरण शुद्ध हो जाता है, तो ग्रह भी उसी के अनुसार फल देने लगते हैं। आपने पूजा से पहले जीवन को सुधारा—इसलिए शांति आई।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, दान से पहले दया रखो, मंत्र से पहले मन शुद्ध करो, और ग्रहों को दोष देने से पहले अपना आचरण देखो। क्योंकि— जो मनुष्य अपने आचरण को साध लेता है, उसके लिए ग्रह स्वतः ही साधक बन जाते हैं।

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Jeewan Aadhar Editor Desk