धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—832

एक बार एक पहुँचे हुए संत अपने कुछ शिष्यों के साथ एक नगर के बाहर कुटिया बनाकर ठहरे। संत की ख्याति बहुत दूर-दूर तक थी, इसलिए नगर के कई लोग उनके दर्शन के लिए आने लगे।

उन्हीं में से नगर का एक बहुत ही अमीर और रसूखदार सेठ भी था। वह सेठ हर दिन संत के पास आता, उनके लिए स्वादिष्ट भोजन लाता, उनके आश्रम की व्यवस्था में पैसा खर्च करता और हर समय उनके आगे-पीछे हाथ बांधे खड़ा रहता। सेठ का समर्पण देखकर आश्रम के बाकी शिष्य सोचते कि यह व्यक्ति तो गुरुदेव का सबसे बड़ा और सच्चा भक्त है।

संत बहुत ज्ञानी थे और वह इंसान के मन के भीतर छिपे स्वार्थ को भली-भांति पढ़ लेते थे।

एक दिन संत ने अपने शिष्यों और भक्तों की परीक्षा लेने का निर्णय लिया। उन्होंने अचानक घोषणा कर दी कि उन्हें एक गंभीर और संक्रामक बीमारी हो गई है और अब उनके पास धन और सिद्धियां भी नहीं रहीं। इसके साथ ही, आश्रम में यह बात भी फैला दी गई कि नगर का राजा संत से किसी बात पर बेहद नाराज हो गया है और जो भी व्यक्ति संत से संबंध रखेगा, उसे राजा के क्रोध का सामना करना पड़ेगा।

जैसे ही यह खबर हवा की तरह उस अमीर सेठ तक पहुँची, उसने आश्रम आना बिल्कुल बंद कर दिया। जो सेठ दिन-रात गुरुदेव के गुण गाता था, वह एक दिन बाजार में संत को सामने से आता देखकर गली बदलकर छिप गया, ताकि कोई उसे उनके साथ देख न ले और राजा तक खबर न पहुँच जाए।

दूसरी ओर, एक गरीब लकड़हारा, जो पहले बस चुपचाप पीछे बैठकर सत्संग सुनता था, वह अपनी जान की परवाह किए बिना रात के अँधेरे में अपनी सूखी रोटी में से आधा हिस्सा और जड़ी-बूटियां लेकर संत की सेवा करने लगा। उसे राजा के क्रोध या बीमारी का कोई डर नहीं था।

कुछ दिनों बाद, नगर का राजा स्वयं अपने मंत्रियों के साथ संत के दर्शन करने कुटिया में आया और उनके चरणों में गिर पड़ा। यह देखकर पूरे नगर में खबर फैल गई कि संत न तो बीमार हैं और न ही राजा उनसे नाराज है, बल्कि राजा तो स्वयं उनका शिष्य है।

यह सुनते ही वह अमीर सेठ फिर से कीमती उपहार लेकर दौड़ता हुआ कुटिया में आया और संत के पैर पकड़कर अपनी भक्ति का दिखावा करने लगा।

संत ने शांति से अपने पैर पीछे खींच लिए, मुस्कुराए और अपने शिष्यों की तरफ देखकर वही बात कही जो आपने पूछी है: “देखो बच्चों, मतलबी लोग और धूल एक जैसे होते हैं, जिस तरफ की हवा चलती है—उस तरफ चल पड़ते हैं।”

संत ने सेठ को समझाते हुए कहा, “जब मेरे सम्मान और प्रसिद्धि की हवा चल रही थी, तो तुम धूल की तरह उड़कर मेरे पास आ गए। जब तुम्हें लगा कि राजा के क्रोध और बीमारी की हवा चल रही है, तो तुम विपरीत दिशा में उड़ गए। लेकिन यह गरीब लकड़हारा धूल नहीं, बल्कि पेड़ की मजबूत जड़ है, जो आंधी में भी अपनी जगह पर टिका रहा।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, बुरा वक्त जीवन में एक ‘फिल्टर’ की तरह काम करता है, जो स्वार्थी लोगों को हमारी ज़िंदगी से बाहर कर देता है। सच्चे इंसान मौसम या हवा का रुख देखकर नहीं बदलते। वे जड़ की तरह होते हैं, जो हर परिस्थिति में आपका साथ देते हैं।

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