एक बार एक युवा और जिज्ञासु शिष्य अपने गुरु (एक सिद्ध संत) के पास गया। वह जीवन को लेकर बहुत उलझन में था।
उसने गुरु से पूछा— “महाराज, संसार में ऐसी अनगिनत चीज़ें हैं जो क्षणभंगुर हैं। धन, प्रसिद्धि, महंगे वस्त्र, बाहरी सुंदरता—हम अच्छी तरह जानते हैं कि ये सब स्थायी सुख नहीं दे सकते। फिर भी हमारा मन चुंबक की तरह इनकी ओर क्यों खिंचा चला जाता है?”
संत मुस्कुराए। उन्होंने कहा, “पुत्र, तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर शब्दों में नहीं, अनुभव में है। मेरे साथ चलो।”
संत उस युवक को लेकर जंगल की ओर चल दिए। चलते-चलते रास्ते में एक बहुत ही सुंदर बेल दिखाई दी। उस बेल पर लाल और नारंगी रंग के बेहद चमकदार, गोल और सुंदर फल लगे हुए थे। वे फल इतने आकर्षक थे कि कोई भी उन्हें देखकर ललचा जाए।
युवक की नज़र उस पर पड़ी और वह रुक गया। उसने कहा, “गुरुदेव! यह फल कितना अद्भुत और सुंदर है। इसे देखकर ही मुंह में पानी आ रहा है। क्या मैं इसे तोड़कर खा सकता हूं?”
संत ने शांति से कहा, “हाँ, बिल्कुल। तोड़ लो और खा लो।”
युवक ने उत्साह के साथ उस सुंदर फल को तोड़ा और उसका एक बड़ा हिस्सा अपने मुंह में रख लिया। लेकिन अगले ही पल, उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। उसका पूरा मुंह भयानक कड़वाहट से भर गया था। वह फल इतना कड़वा और कसैला था कि युवक ने तुरंत उसे थूक दिया और पानी के लिए इधर-उधर भागने लगा।
जब युवक ने कुल्ला करके अपना मुंह साफ कर लिया, तब संत उसके पास आए और बोले— “पुत्र, यह ‘इंद्रायण का फल’ है। यह बाहर से जितना आकर्षक और मीठा दिखता है, अंदर से उतना ही विषैला और कड़वा होता है।”
संत ने युवक के कंधे पर हाथ रखा और समझाया: “यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है। संसार के अधिकांश भौतिक सुख और आकर्षण इसी इंद्रायण के फल की तरह हैं। हमारी आंखें और इंद्रियां उनकी बाहरी चमक-दमक, रंग-रूप और दिखावे को देखकर धोखा खा जाती हैं। मन को लगता है कि जो बाहर से इतना सुंदर है, वह भीतर से परम आनंद (स्थायी सुख) देगा।”
“परंतु जब इंसान उस सुख को पा लेता है और उसका उपभोग करता है, तब उसे अहसास होता है कि भीतर तो केवल खालीपन और कड़वाहट है। हमारी परेशानी यह है कि हम वस्तु की बाहरी सुंदरता को ही उसका आंतरिक गुण मान बैठते हैं।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जब हम इस बात के प्रति जागरूक हो जाते हैं कि यह आकर्षण केवल कुछ पल का है, तो हमारा मन धीरे-धीरे उन चीज़ों से वैराग्य लेने लगता है और हम सच्चे व स्थायी सुख (भीतरी आनंद) की ओर मुड़ जाते हैं।








