ब्रज भूमि के एक छोटे से गाँव में एक संत रहते थे। होली का समय था, चारों ओर ढोलक की थाप और फाग के गीत गूंज रहे थे। गाँव के लोग रंग और उमंग में डूबे हुए थे, लेकिन कुछ लोग आपसी रंजिश भी निकाल रहे थे—किसी ने किसी पर कीचड़ फेंका, तो कोई पुरानी बातों पर झगड़ पड़ा।
संत जी ने यह दृश्य देखा तो वे चुपचाप चौपाल पर बैठ गए। जब फाग गाने वाले उनके पास पहुँचे तो संत मुस्कुराकर बोले— “फाग केवल रंग लगाने का नाम नहीं, फाग मन के मैल मिटाने का नाम है।”
लोगों ने पूछा, “गुरुदेव, मन का मैल कैसे मिटे?”
संत बोले, “जैसे भक्त प्रह्लाद ने अग्नि में भी विश्वास नहीं छोड़ा और बुराई पर अच्छाई की जीत हुई, वैसे ही होली हमें सिखाती है कि ईर्ष्या, द्वेष और अहंकार की ‘होलिका’ जलाओ।”
उन्होंने आगे कहा— “रंग चेहरे पर एक दिन रहता है, पर प्रेम का रंग जीवन भर साथ रहता है।
जो फाग क्षमा के साथ खेली जाए, वही सच्ची होली कहलाए।”
गाँव के बुजुर्ग बोले, “तो क्या करें संत जी?”
संत ने कहा, “आज जिस किसी से मन में बैर हो, उसके घर जाओ। गुलाल से पहले ‘माफ़ी’ लगाओ। रंग से पहले ‘प्रेम’ लगाओ। तभी फाग सफल होगी।”
उस दिन गाँव में एक नया दृश्य था— जहाँ कल तक कटुता थी, वहाँ आज गले मिलना था। जहाँ मन में दूरी थी, वहाँ आज अपनापन था।
और संत जी धीरे से गुनगुनाने लगे—
“मन की होलिका जला दो भाई,
प्रेम का फाग रचाओ।
रंग नहीं, संस्कार बरसाओ,
जीवन को मंगल बनाओ।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, फाग हमें सिखाती है कि बाहर का रंग तभी सुंदर है जब भीतर का मन निर्मल हो। प्रेम, क्षमा और सद्भाव ही सच्चे उत्सव का आधार हैं।








