एक समय की बात है। पहाड़ों की तलहटी में एक शांत-सा आश्रम था। वहाँ एक साधक वर्षों से साधना कर रहा था। जीवन सरल था—कम आवश्यकताएँ, नियमित दिनचर्या और मौन में डूबी साधना। पर एक दोष था—उसका मन नकारात्मक विचारों को जल्दी पकड़ लेता था।
एक बरसात के दिन आश्रम की छत से पानी की कुछ बूँदें टपकने लगीं। समस्या बहुत छोटी थी—एक कड़ी ढीली हो गई थी। पास के गाँव से बुलाकर कारीगर बुलाया जा सकता था, या स्वयं ठीक की जा सकती थी। लेकिन साधक का मन तुरंत आशंकाओं से भर गया— “अगर छत गिरी तो? अगर पुस्तकें भीग गईं तो? अगर लोग कहने लगे कि मैं अपने आश्रम को भी नहीं संभाल सकता?”
इन विचारों ने उसे बेचैन कर दिया। ध्यान में बैठा तो मन बार-बार उसी ओर भागता रहा। भोजन किया तो स्वाद नहीं आया। शाम तक वह क्रोधित और थका हुआ महसूस करने लगा।
छोटी-सी समस्या अब उसके लिए बड़ी पीड़ा बन चुकी थी।
रात को तेज़ बारिश हुई। पानी की कुछ और बूँदें टपकीं। साधक ने मान लिया—“सब खत्म हो गया।” उसने न तो समाधान खोजा, न किसी से मदद ली—बस मन ही मन डर बढ़ाता रहा।
अगली सुबह उसके गुरु आश्रम आए। साधक की आँखों के नीचे काले घेरे और चेहरे की उदासी देखकर उन्होंने पूछा— “वत्स, आज मन इतना भारी क्यों है?”
साधक ने पूरी बात बताई, और अपने डर भी गिना दिए। गुरु ध्यान से सुनते रहे। फिर छत की ओर देखा, पास रखी सीढ़ी उठाई और कुछ ही क्षणों में ढीली कड़ी कस दी। पानी टपकना बंद हो गया।
गुरु मुस्कुराए और बोले— “समस्या तो इतनी-सी थी, पर तुमने उसे मन में पहाड़ बना लिया।”
फिर आगे कहा— “नकारात्मकता का स्वभाव यही है—वह समाधान से पहले डर दिखाती है।
डर जब मन में बैठ जाता है, तो बुद्धि काम करना बंद कर देती है।”
उन्होंने साधक से एक प्रश्न किया— “यदि तुम पहले समाधान सोचते, तो क्या यह समस्या इतनी बड़ी लगती?” साधक चुप रहा।
गुरु बोले— “याद रखो, जीवन में अधिकतर दुख समस्याओं से नहीं,उन पर चढ़ी नकारात्मक सोच से आते हैं। एक छोटा काँटा अगर मन में चुभता रहे, तो वही घाव बन जाता है।”
उस दिन साधक को गहरी समझ मिली। उसने जाना—समस्या का आकार वास्तविकता से नहीं,
हमारी सोच से तय होता है।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, नकारात्मकता छोटी समस्या को संकट बना देती है, और सकारात्मक दृष्टि बड़े संकट में भी समाधान दिखा देती है। मन को डर का घर मत बनने दो—उसे समाधान का द्वार बनाओ।








