एक समय की बात है। एक नगर में शास्त्रों का अपार ज्ञान रखने वाला एक विद्वान रहता था। वेद, उपनिषद, दर्शन और नीति—सब कुछ उसे कंठस्थ था। नगर में कोई भी वाद-विवाद हो, वही अंतिम निर्णय देने वाला माना जाता था। लोग उसके ज्ञान से प्रभावित थे, पर उसके व्यवहार में विनम्रता नहीं थी। वह अपने ज्ञान को सेवा नहीं, बल्कि अपने मान-सम्मान और आत्मगौरव के लिए उपयोग करता था।
उसी नगर के बाहर एक छोटा सा आश्रम था, जहाँ एक संत निवास करते थे। वे न तो बड़े प्रवचन देते थे, न ही अपनी विद्वता का प्रदर्शन करते थे। वे चुपचाप लोगों की सेवा करते—किसी बीमार को जड़ी-बूटी देते, किसी दुखी को सांत्वना देते, किसी भूखे को भोजन करा देते। लोग उन्हें “सरल बाबा” कहकर पुकारते थे।
एक वर्ष नगर में भयंकर संकट आया। लगातार सूखा पड़ने से अन्न समाप्त होने लगा। लोग भयभीत हो गए। विद्वान को बुलाया गया। उसने बड़े-बड़े ग्रंथों के उदाहरण देकर भाग्य, कर्म और पूर्वजन्म की बातें समझाईं, पर लोगों के पेट की आग नहीं बुझी।
तभी आश्रम से संत नगर में आए। उन्होंने लोगों को एकत्र किया और कहा— “ज्ञान का अर्थ केवल जानना नहीं, करना भी है।” उन्होंने सबको श्रम बाँटना सिखाया, जल-स्रोतों को साफ करवाया, अन्न का सही वितरण कराया और नगर के सामर्थ्यवान लोगों को जरूरतमंदों की सहायता के लिए प्रेरित किया। कुछ ही दिनों में हालात बदलने लगे।
विद्वान यह सब देख रहा था। उसके भीतर पहली बार प्रश्न उठा—क्या मेरा ज्ञान केवल शब्दों तक सीमित है? वह संत के पास गया और विनम्र स्वर में बोला,“महाराज, मेरे पास ज्ञान तो बहुत है, पर आज समझ आया कि वह केवल दिखावा बनकर रह गया।”
संत ने शांत भाव से उत्तर दिया, “ज्ञान दीपक की तरह होता है। यदि वह केवल अपने घर को रोशन करे तो सीमित है, पर यदि दूसरों के अंधकार को भी दूर करे, तभी उसका मूल्य है।”
उस दिन विद्वान ने अपने अहंकार का त्याग किया और अपने ज्ञान का उपयोग शिक्षा, सेवा और समाज के कल्याण में करने लगा।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, ज्ञान केवल आत्मगौरव या दिखावे के लिए नहीं होना चाहिए। उसका वास्तविक उद्देश्य स्वयं का उत्थान और समाज की भलाई है। जो ज्ञान दूसरों के काम न आए, वह बोझ बन जाता है; और जो सेवा में लगे, वही सच्चा ज्ञान कहलाता है।








