धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—793

बहुत समय पहले की बात है। एक प्रसिद्ध संत पहाड़ों की तलहटी में एक छोटे से आश्रम में रहते थे। दूर-दूर से लोग अपने दुःख, भय और प्रश्न लेकर उनके पास आते थे। कोई धन की चिंता में था, कोई रिश्तों की पीड़ा में, तो कोई जीवन के उद्देश्य को लेकर उलझा हुआ।

एक दिन एक युवक आया। उसके चेहरे पर थकान थी, आँखों में असंतोष और मन में भारीपन। उसने संत के चरणों में बैठकर कहा, “महाराज, मैंने सब कुछ पाने का प्रयास किया—शिक्षा, धन, सम्मान—फिर भी मन अशांत है। छोटी-छोटी बातें मुझे भीतर तक तोड़ देती हैं। क्या जीवन का स्वभाव ही दुःख है?”

संत ने आँखें खोलीं और शांत स्वर में बोले, “वत्स, जीवन का स्वभाव दुःख नहीं है, दुःख का स्वभाव अज्ञानता है।”

युवक चकित रह गया।

संत ने पास पड़ी मिट्टी की दीया उठाई और बोले,“मान लो यह जीवन है और इसके भीतर जलने वाला दीपक है—सत्य। जब दीपक बुझा रहता है, तब अंधकार फैलता है। उसी अंधकार में हमें रस्सी भी साँप दिखाई देती है, छाया भी शत्रु लगती है और मौन भी अपमान प्रतीत होता है।”

संत ने आगे कहा, “अज्ञानता हमें यह विश्वास दिला देती है कि दूसरा ही हमारे दुःख का कारण है, परिस्थितियाँ ही हमारी शत्रु हैं, और ईश्वर हमसे दूर है। जबकि सत्य यह है कि दुःख बाहर नहीं, हमारी दृष्टि में होता है।”

युवक ने पूछा, “तो फिर सत्य क्या है, महाराज?”

संत बोले, “सत्य यह है कि तुम वह नहीं हो जो अपमानित होता है, तुम वह नहीं हो जो असफल होता है,तुम वह भी नहीं हो जो भयभीत होता है। ये सब मन की अवस्थाएँ हैं—और मन स्वयं अज्ञानता से बंधा हुआ है।”

संत ने शांत स्वर में कहा, “जब तक मन स्वयं को शरीर और परिस्थितियों तक सीमित मानता है, तब तक दुःख उसका स्वाभाविक अनुभव बन जाता है। लेकिन जिस दिन मन यह जान लेता है कि वह साक्षी है, उस दिन दुःख की जड़ ही कट जाती है।”

युवक अब पूर्ण ध्यान में था।

संत बोले,“सत्य को जानने का अर्थ संसार छोड़ना नहीं है। सत्य को जानने का अर्थ है—
संसार में रहते हुए भ्रम से मुक्त होना। जब सत्य का ज्ञान होता है, तो अपेक्षाएँ ढीली पड़ जाती हैं, अहंकार गलने लगता है और क्षमा स्वतः जन्म लेती है।”

अंत में संत ने कहा, “याद रखो— अज्ञानता प्रश्न खड़े करती है, ज्ञान समाधान नहीं, शांति देता है। और जहाँ शांति है, वहाँ दुःख टिक नहीं सकता।”

युवक ने सिर झुका दिया। उसके प्रश्न समाप्त नहीं हुए थे, लेकिन उसके भीतर पहली बार मौन उतर आया था।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, दुःख को बदलने की नहीं, दृष्टि को बदलने की आवश्यकता है। क्योंकि जैसे ही सत्य प्रकट होता है, वैसे ही सारी गलतफहमियाँ स्वतः विलीन हो जाती हैं।

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Jeewan Aadhar Editor Desk