धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज जी ​के प्रवचनों से—803

क प्रसिद्ध आश्रम में गुरु वशिष्ठ रहते थे। उनके दो शिष्य थे—सूर्यकांत और चंद्रमोहन।

सूर्यकांत जैसा उसका नाम था, वैसा ही उसका स्वभाव था। वह बहुत तेज़ था, शास्त्रों का उसे गहरा ज्ञान था, और उसकी आवाज़ में शेर जैसी दहाड़ थी। जब वह बोलता, तो पूरी सभा मंत्रमुग्ध हो जाती। उसे हर कोई “आश्रम का गौरव” कहता था।

दूसरी ओर, चंद्रमोहन बहुत शांत और संकोची स्वभाव का था। उसे शास्त्र याद करने में समय लगता था और वह भीड़ में बोलने से घबराता था। हाँ, वह बांसुरी बहुत अच्छी बजाता था, लेकिन सूर्यकांत की कामयाबी के शोर में उसकी बांसुरी की धुन किसी को सुनाई नहीं देती थी।

धीरे-धीरे चंद्रमोहन के मन में हीन भावना घर कर गई। वह सोचने लगा, “सूर्यकांत कितना महान है, सब उसकी तारीफ करते हैं। और मैं? मैं कुछ भी नहीं। मेरा जीवन व्यर्थ है।”

हताश होकर एक रात उसने आश्रम छोड़ने का फैसला किया। वह अपनी पोटली उठाकर मुख्य द्वार की ओर जा रहा था कि तभी पीछे से गुरु वशिष्ठ की आवाज़ आई: “चंद्रमोहन! इतनी रात गए कहाँ जा रहे हो?”

चंद्रमोहन की आँखों से आंसू छलक पड़े। वह बोला, “गुरुदेव, मैं इस आश्रम के लायक नहीं हूँ। सूर्यकांत सूरज की तरह चमकता है, और मैं उसके सामने एक बुझे हुए दीपक जैसा हूँ। मेरी कोई पहचान नहीं है।”

गुरु वशिष्ठ मुस्कुराए और चंद्रमोहन का हाथ पकड़कर उसे आश्रम के खुले आंगन में ले गए। पूर्णिमा की रात थी, आसमान में चाँद अपनी पूरी चांदनी बिखेर रहा था।

गुरुजी ने आसमान की ओर इशारा करते हुए पूछा: “बेटा, ऊपर देखो। क्या तुम्हें वह चाँद दिखाई दे रहा है?” चंद्रमोहन ने सिर हिलाया।

गुरुजी ने फिर पूछा, “अब सोचो, अगर यह चाँद सोचे कि ‘मैं सूरज जैसा गर्म और तेज़ क्यों नहीं हूँ?’, और सूरज बनने की कोशिश में अपनी शीतलता छोड़ दे, तो क्या होगा?”

चंद्रमोहन ने सोचा और कहा, “तो रात में यह सुकून और ठंडक खत्म हो जाएगी, गुरुवर। सब कुछ जल जाएगा।”

गुरु वशिष्ठ ने गंभीरता से समझाया—”बेटा, प्रकृति ने सूरज को ‘दिन’ का राजा बनाया है और चाँद को ‘रात’ का। सूरज का काम है जगाना और तपाना, जबकि चाँद का काम है सुलाना और शीतलता देना। अगर चाँद, सूरज से अपनी तुलना करके दुखी होने लगे, तो यह उसकी मूर्खता होगी, क्योंकि जब सूरज डूबता है, तभी चाँद का वक्त आता है।”

उन्होंने आगे कहा: “सूर्यकांत ‘तर्क’ का सूरज है, और तुम ‘भावना’ के चाँद हो। तुम्हारी बांसुरी उन लोगों के घाव भरती है, जहाँ सूर्यकांत के शब्द नहीं पहुँच पाते। अपनी तुलना उससे मत करो। तुम्हारा वक्त और तुम्हारा आकाश अलग है।”

चंद्रमोहन को अपनी गलती समझ आ गई। उसने समझ लिया कि वह ‘कम’ नहीं है, बस ‘अलग’ है। उस रात उसने अपनी बांसुरी उठाई और ऐसी तान छेड़ी कि पूरा आश्रम नींद में भी मुस्कुरा उठा।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, कोई 22 साल की उम्र में सफल हो जाता है (सूरज की तरह सुबह चमकता है), तो कोई 40 की उम्र में अपनी पहचान बनाता है (चाँद की तरह शाम का इंतज़ार करता है)। दोनों सही हैं। जब आप अपनी तुलना किसी और से करते हैं, तो आप अपनी खुद की ‘खूबियों’ का अपमान कर रहे होते हैं। मछली को पेड़ पर चढ़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। आप जो हैं, उसमें सर्वश्रेष्ठ बनें, न कि दूसरे की नकल करें।

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