एक बार की बात है, काशी के घाट पर एक बहुत ज्ञानी महात्मा जी रहते थे। उनका एक शिष्य था, दीनबंधु। दीनबंधु स्वभाव से अच्छा था, लेकिन उसमें एक बहुत बड़ी कमी थी—वह बहुत आलसी था। वह हमेशा ‘आज’ का काम ‘कल’ पर टाल देता था और हमेशा अपने सुनहरे भविष्य के सपने देखता रहता था। वह अक्सर कहता, “कल जब मेरा अच्छा वक्त आएगा, तब मैं बहुत मेहनत करूँगा।”
महात्मा जी उसे सुधारना चाहते थे। एक दिन उन्होंने दीनबंधु को अपने पास बुलाया और उसे एक चमकीला काला पत्थर देते हुए कहा: “बेटा दीनबंधु, मैं तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हूँ। यह कोई साधारण पत्थर नहीं, बल्कि पारस पत्थर है। यह लोहे की किसी भी चीज़ को छू ले, तो वह सोने की बन जाती है।”
दीनबंधु की आँखें फटी की फटी रह गईं। महात्मा जी ने आगे कहा, “लेकिन मेरी एक शर्त है। मैं यह पत्थर तुम्हें सिर्फ आज सूर्यास्त तक के लिए दे रहा हूँ। शाम को सूरज डूबते ही मैं इसे वापस ले लूँगा। तुम्हारे पास जितना भी लोहा हो, उसे सोना बना लो और अपना ‘कल’ संवार लो।”
दीनबंधु पत्थर लेकर खुशी-खुशी अपने घर भागा। उसने सोचा, “वाह! अब तो मेरा कल बदल जाएगा। मैं अमीर बन जाऊँगा।”
घर पहुँचकर उसने देखा कि उसके पास लोहे का कोई बड़ा सामान नहीं है। उसने सोचा, “बाज़ार जाकर ढेर सारा कबाड़ और लोहे का सामान खरीद लाता हूँ।” लेकिन फिर उसे लगा, “अभी तो सुबह है, पूरा दिन पड़ा है। पहले भरपेट खाना खा लेता हूँ, फिर आराम से बाज़ार जाऊँगा। आखिर पारस पत्थर तो मेरे पास ही है।”
उसने खाना खाया। खाने के बाद उसे नींद आने लगी। उसने सोचा, “धूप बहुत तेज़ है। थोड़ी देर सो लेता हूँ। शाम होने से पहले उठकर बाज़ार जाऊंगा, लोहा लाऊंगा और सोना बना लूँगा। मेरे पास ‘कल’ के लिए इतना सोना होगा कि मुझे जीवन भर काम नहीं करना पड़ेगा।”
वह ‘कल’ के सुखद सपने देखते-देखते गहरी नींद में सो गया।
जब उसकी आँख खुली, तो उसने देखा कि शाम हो चुकी है और सूरज बस डूबने ही वाला है। वह घबराकर उठा और बाज़ार की तरफ भागा। वह हाफता हुआ रास्ते में ही था कि सामने उसे महात्मा जी आते हुए दिखाई दिए।
उसी वक्त सूरज पूरी तरह डूब गया।
महात्मा जी ने हाथ आगे बढ़ाया और कहा, “वत्स! सूर्यास्त हो गया। मेरा पत्थर वापस करो।”
दीनबंधु उनके पैरों में गिर पड़ा और रोते हुए बोला, “गुरुवर! मुझे बस थोड़ा और समय दे दीजिये। मैं तो अभी बाज़ार जा ही रहा था। मैंने अभी तक एक भी टुकड़ा सोना नहीं बनाया। मेरा तो ‘कल’ बर्बाद हो जाएगा!”
महात्मा जी ने गंभीरता से कहा: “मूर्ख! तुमने ‘कल’ के सुख के इंतज़ार में, अपने हाथ में मौजूद ‘आज’ को खो दिया। जो इंसान आज की कीमत नहीं समझता, उसका कल कभी नहीं आता।”
उन्होंने पत्थर वापस ले लिया और उसे समझाया— “तुम सपने देख रहे थे कि कल अमीर बनोगे, लेकिन उस सपने को सच करने के लिए जो मेहनत ‘आज’ करनी थी, उसे तुम नींद में गँवा बैठे। याद रखो, भविष्य (कल) आकाश में लिखे हुए वादे जैसा है, लेकिन वर्तमान (आज) हाथ में मौजूद नकद है।”
दीनबंधु समझ गया कि सुनहरे कल की चाबी, आज की मेहनत ही है।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, वक्त किसी का इंतज़ार नहीं करता। हम अक्सर सोचते हैं कि हमारे पास बहुत वक्त है, लेकिन यही वहम हमें असफल बनाता है। ‘कल’ की चिंता में आज को आलस में बिताना सबसे बड़ी मूर्खता है। आपका ‘कल’ जादू से नहीं, बल्कि उस पसीने से संवरेगा जो आप ‘आज’ बहाएंगे।








