धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज जी ​के प्रवचनों से—802

एक पुराने आश्रम में संत रामदास रहते थे। उनका एक सेवक था, भोला। भोला आश्रम के बगीचे के लिए रोज़ नदी से पानी लाता था। उसके पास दो बड़े घड़े थे, जिन्हें वह एक डंडे के दोनों सिरों पर टांगकर अपने कंधे पर रखकर लाता था।

उनमें से एक घड़ा एकदम सही था, जबकि दूसरे घड़े में एक बारीक दरार थी।

रोज़ाना जब भोला नदी से पानी भरकर आश्रम पहुँचता, तो सही वाला घड़ा पूरा भरा रहता, लेकिन फूटा हुआ घड़ा रिसते-रिसते आधा खाली हो जाता। ऐसा पूरे दो साल तक चलता रहा।

सही वाले घड़े को अपनी काबिलियत पर बहुत घमंड था कि वह एक बूंद पानी भी नहीं गिरने देता। लेकिन वह फूटा हुआ घड़ा अंदर ही अंदर शर्मिंदा रहता था। उसे लगता था कि वह अधूरा है, बेकार है और अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पा रहा।

एक दिन, उस फूटे हुए घड़े की उदासी भोला (शिष्य) से देखी नहीं गई। उसने खुद को उस घड़े की जगह रखकर सोचा और संत रामदास जी के पास जाकर बोला: “गुरुवर, मैं आश्रम छोड़ना चाहता हूँ। मुझमें बहुत कमियां हैं। मैं उस फूटे हुए घड़े जैसा हूँ। मैं कितनी भी मेहनत करूँ, परिणाम पूरा नहीं आता। मुझे लगता है मैं आपके किसी काम का नहीं।”

संत रामदास जी समझ गए कि भोला के मन में हीन भावना घर कर गई है। वे मुस्कुराए और बोले, “ठीक है, तुम चले जाना। लेकिन जाने से पहले, आज जब तुम पानी लाने जाओ, तो रास्ते के उस तरफ देखना जिधर वह ‘फूटा हुआ घड़ा’ रहता है।”

भोला भारी मन से पानी लाने गया। लौटते समय उसने गुरुजी के कहे अनुसार रास्ते के उस तरफ देखा।

वह हैरान रह गया! रास्ते के जिस तरफ ‘फूटा हुआ घड़ा’ होता था, वहां रंग-बिरंगे सुंदर फूल खिले हुए थे। जबकि दूसरी तरफ (सही घड़े वाली तरफ) केवल सूखी धूल और पत्थर थे।

आश्रम पहुँचकर उसने गुरुजी को यह बताया। संत रामदास जी ने प्यार से भोला के कंधे पर हाथ रखा और समझाया: “बेटा, मैं जानता था कि इस घड़े में ‘कमी’ है कि वह रिसता है। लेकिन मैंने उस कमी को उसकी ‘ताकत’ बना दिया। मैंने रास्ते के उस तरफ फूलों के बीज डाल दिए थे। पिछले दो साल से यह घड़ा रोज थोड़ा-थोड़ा पानी टपका कर उन बीजों को सींच रहा था। अगर इसमें यह ‘कमी’ (दरार) न होती, तो आज हमारा आश्रम इन सुंदर फूलों से न महक रहा होता।”

भोला की आँखों में आंसू आ गए।

संत जी ने फिर वह बात कही जो जीवन का मूल मंत्र है: “भोला, हम सब में कोई न कोई दरार, कोई न कोई कमी है। लेकिन जिस दिन तुम अपनी कमी को अपना लोगे और उसे शर्मिंदगी नहीं, बल्कि अपनी विशेषता बना लोगे, उस दिन तुम्हें कोई हरा नहीं सकता। तुम्हारी वह ‘कमजोरी’ ही इस दुनिया को कुछ ऐसा दे जाएगी जो ‘पूर्णता’ कभी नहीं दे सकती।”

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Jeewan Aadhar Editor Desk