एक बार स्वामी आत्मानंद जी अपने शिष्य केशव के साथ एक नदी के किनारे खड़े थे। उन्हें सूर्यास्त से पहले नदी के उस पार अपने आश्रम पहुँचना था। नदी चौड़ी थी और मौसम थोड़ा खराब लग रहा था।
नाव नदी के बीच में पहुँची ही थी कि अचानक मौसम ने भयानक रूप ले लिया। काला आसमान गरजने लगा और तेज हवाएँ चलने लगीं। नदी में उफान आ गया। नांव तिनके की तरह डगमगाने लगी।
शिष्य केशव डर गया। उसने अपने हाथ से पतवार छोड़ दी और नाव के कोने में दुबक कर बैठ गया। उसने आँखें बंद कर लीं और जोर-जोर से चिल्लाने लगा, “हे भगवान! हमारी किस्मत खराब है। आज मेरी मृत्यु निश्चित है। अब हमें कोई नहीं बचा सकता!”
केशव ने मान लिया कि किस्मत का दरवाजा बंद हो चुका है।
तभी स्वामी आत्मानंद जी ने जोर से केशव के कंधे को हिलाया और कड़कती आवाज़ में बोले: “मूर्ख! पतवार उठा! यह वक्त किस्मत के आगे रोने का नहीं, उससे लड़ने का है।”
केशव रोते हुए बोला, “गुरुजी, आप देख नहीं रहे? तूफान कितना बड़ा है! हम हार जाएंगे।”
स्वामी जी ने खुद पतवार संभाली और पूरी ताकत से पानी को काटते हुए बोले: “केशव! तूफान की फितरत है डराना, और कश्ती की फितरत है आगे बढ़ना। अगर तूफान अपनी ‘ज़िद’ पर अड़ा है कि हमें डुबो देगा, तो हम अपनी ‘ज़िद’ पर अड़ेंगे कि हम पार जाएंगे।”
स्वामी जी की ललकार और बाज़ुओं की ताकत देखकर केशव में भी बिजली दौड़ गई। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने किस्मत के दरवाजे पर सर पीटना बंद किया और दूसरी पतवार थाम ली।
अब मुकाबला था—एक तरफ कुदरत का तूफान और दूसरी तरफ इंसानी हौसले का तूफान।
हवाएं उन्हें पीछे धकेलतीं, लेकिन गुरु-शिष्य अपनी पूरी जान लगाकर नाव को आगे धकेलते। उनके हाथों से खून रिसने लगा, सांसें फूल गईं, लेकिन उन्होंने ‘ज़िद’ नहीं छोड़ी।
आखिरकार, उनकी मेहनत रंग लाई। तूफान हार गया और उनकी कश्ती किनारे पर जा लगी।
किनारे पर पहुँचकर केशव ने हाफते हुए स्वामी जी के चरण पकड़ लिए और कहा, “गुरुजी, आज अगर आप न होते, तो मेरी किस्मत में जल समाधि लिखी थी।”
स्वामी जी मुस्कुराए और बोले: “बेटा, किस्मत ने तो दरवाजा बंद कर ही दिया था। लेकिन याद रखना, तूफान भी वहीं हार मान लेते हैं, जहाँ कश्तियां अपनी ज़िद पर अड़ी होती हैं। तूने अपनी जान बचाने की भीख मांगना छोड़कर, जब कर्मों का तूफान पैदा किया, तो किनारे के दरवाजे अपने आप खुल गए।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जब मुसीबत आती है, तो कमजोर इंसान कुंडली और किस्मत देखता है, लेकिन साहसी इंसान अपनी बाजुओं की ताकत देखता है। जिद्दी होना बुरा है, लेकिन जब बात लक्ष्य या अस्तित्व की हो, तो ‘ज़िद’ ही वह ईंधन है जो असंभव को संभव बनाती है। ध्यान रखना, बंद दरवाजों के आगे रोने से वो नहीं खुलते, उन्हें खोलने के लिए इतनी मेहनत करो कि वे टूट जाएं या खुद खुल जाएं।








