धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—810

एक बार की बात है, एक बहुत अमीर और प्रभावशाली राजा था, जिसका नाम राजा प्रताप था। राजा के तीन बहुत खास दोस्त थे।

पहला दोस्त: राजा इसे सबसे ज्यादा प्यार करता था। इसे हर समय अपने साथ रखता, इसे सजाता-संवारता और इसकी हर मांग पूरी करता।

दूसरा दोस्त: राजा इसे भी बहुत चाहता था, लेकिन पहले वाले से थोड़ा कम। वह अपनी परेशानियां इसके साथ बांटता था।

तीसरा दोस्त: राजा इस दोस्त पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता था। वह हमेशा चुपचाप राजा के पीछे रहता, लेकिन राजा ने कभी उसे प्यार नहीं दिया, न ही कभी उसकी सुध ली।

समय का चक्र घूमा। राजा बूढ़ा हो गया और उसकी मृत्यु की घड़ी आ गई। यमदूत उसे लेने के लिए दरवाजे पर खड़े थे। राजा बहुत घबरा गया। उसे अकेले जाने में डर लग रहा था।

उसने सोचा, “मैं अपने दोस्तों को साथ ले चलता हूँ।”

उसने पहले दोस्त (जिसे वह सबसे ज्यादा प्यार करता था) को बुलाया और कहा: “मेरे प्यारे दोस्त, मैंने पूरी जिंदगी तुम्हारी सेवा की, तुम्हें संवारा। अब मैं मर रहा हूँ। क्या तुम मेरे साथ चलोगे?” पहले दोस्त ने तुरंत सिर हिलाया और रूखे स्वर में कहा: “माफ़ करना राजन! मैं यहीं तक तुम्हारे साथ था। जैसे ही तुम्हारी सांसें बंद होंगी, मैं तुम्हारा साथ छोड़ दूँगा। मैं आगे नहीं जा सकता।” राजा का दिल टूट गया। (यह पहला दोस्त उसका शरीर और धन था, जो मृत्यु के बाद यहीं रह जाता है।)

फिर उसने दूसरे दोस्त को बुलाया और कहा: “मित्र, पहला दोस्त तो धोखेबाज निकला। तुम तो मेरे साथ चलोगे ना?” दूसरे दोस्त ने दुखी होकर कहा: “राजन, मैं तुम्हारे साथ चल तो सकता हूँ, लेकिन सिर्फ शमशान घाट तक। उसके आगे जाने की मुझे अनुमति नहीं है। वहां तुम्हें अकेले ही जाना होगा।” राजा निराश हो गया। (यह दूसरा दोस्त उसके परिवार और रिश्तेदार थे, जो केवल कब्र तक साथ देते हैं।)

अब राजा पूरी तरह अकेला महसूस कर रहा था। अंधेरा छा रहा था। तभी पीछे से एक कमजोर सी आवाज़ आई: “राजन! घबराओ मत, मैं तुम्हारे साथ चलूँगा। चाहे अंधेरा हो या मृत्यु, मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।”

राजा ने मुड़कर देखा। यह उसका तीसरा दोस्त था—दुबला-पतला, कमजोर और मैला-कुचैला। राजा ने उसे पूरी जिंदगी इग्नोर किया था, इसलिए वह इतना कमजोर हो गया था।

राजा की आंखों में आंसू आ गए। उसने रोते हुए कहा: “मैंने पूरी जिंदगी उन दो दोस्तों की सेवा की जो मुझे छोड़कर चले गए। और तुम… जिसे मैंने कभी पूछा तक नहीं, आज तुम ही मेरे सबसे बड़े वफादार निकले।”

वह तीसरा दोस्त मुस्कुराया और बोला: “राजन, मैं तुम्हारा ‘चरित्र’ हूँ। तुमने भले ही मुझे नजरअंदाज किया, लेकिन मैं तुम्हारी परछाई नहीं हूँ जो अंधेरे में साथ छोड़ दे। मैं तुम्हारी आत्मा का हिस्सा हूँ। तुम जहां भी जाओगे—स्वर्ग, नर्क या किसी और जन्म में—मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा।”

राजा को अपनी गलती समझ आ गई, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथी जी, धन और जवानी परछाई की तरह हैं। जब तक जीवन का ‘सूरज’ (सुख) चमक रहा है, ये साथ दिखते हैं। जैसे ही बुढ़ापे या मुसीबत का ‘अंधेरा’ आता है, परछाई (धन/रूप) गायब हो जाती है। चरित्र वह दीपक है जो अंधेरे में ही सबसे ज्यादा चमकता है।

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