एक बार की बात है, बनारस के घाट पर एक युवक बैठा रो रहा था। उसका नाम विशाल था। विशाल बहुत निराश था क्योंकि उसे शहर के एक बहुत बड़े ज्योतिषी ने बताया था कि उसके हाथ में “सफलता की लकीर” ही नहीं है।
ज्योतिषी ने कहा था, “बेटा, तुम कितनी भी मेहनत कर लो, तुम्हारे हाथ में राजयोग नहीं है। तुम जीवन भर संघर्ष ही करोगे।”
यह सुनकर विशाल ने हार मान ली थी। वह सोचता, “जब किस्मत में ही नहीं लिखा, तो हाथ-पैर मारने से क्या फायदा?”
उसी घाट पर एक महान संत, स्वामी आत्मानंद जी, अपने शिष्यों के साथ गुजर रहे थे। उन्होंने युवक को रोते देखा तो रुक गए। स्वामी जी ने पूछा, “बेटा, तुम इतने हताश क्यों हो?”
विशाल ने अपनी हथेलियाँ उनके सामने फैला दीं और रोते हुए बोला, “महाराज, देखिए मेरे हाथों को। विद्वानों ने कहा है कि इनमें धन और सफलता की लकीरें नहीं हैं। मेरा जीवन व्यर्थ है।”
स्वामी जी जोर से हँसे। उन्होंने कहा, “अच्छा! तो तुम्हारी समस्या ये लकीरें हैं? चलो मेरे साथ, मैं तुम्हें किसी से मिलवाता हूँ।”
स्वामी जी उसे थोड़ी दूर स्थित एक आश्रम में ले गए। वहां अंदर एक कमरे में एक व्यक्ति ज़मीन पर बैठकर बड़े ध्यान से एक बहुत ही सुंदर चित्र बना रहा था। वह रंगों को इतनी बारीकी से भर रहा था कि विशाल देखता ही रह गया।
लेकिन जब विशाल ने ध्यान से देखा, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उस चित्रकार के दोनों हाथ ही नहीं थे!
वह अपने पैर की उंगलियों में ब्रश फंसाकर पेंटिंग कर रहा था। उसके चेहरे पर एक अद्भुत शांति और आत्मविश्वास था। पास ही कई मेडल और पुरस्कार रखे थे जो उसने अपनी कला के लिए जीते थे।
स्वामी जी ने विशाल के कंधे पर हाथ रखा और पूछा: “विशाल, इस व्यक्ति को देखो। यह देश का जाना-माना चित्रकार है। लोग इसकी पेंटिंग खरीदने के लिए लाखों रुपए देते हैं।”
फिर स्वामी जी ने एक ऐसा प्रश्न किया जिसने विशाल की सोच बदल दी: “अब मुझे बताओ, अगर सफलता ‘हाथों की लकीरों’ में होती है, तो इस व्यक्ति के पास तो हाथ ही नहीं हैं। फिर इसकी किस्मत इतनी बुलंद कैसे है? इसकी ‘सफलता की लकीर’ कहाँ है?”
विशाल निशब्द हो गया। उसके पास कोई जवाब नहीं था।
स्वामी जी ने उसे समझाया: “बेटा, ईश्वर ने हाथ दिए हैं कर्म करने के लिए, लकीरें देखने के लिए नहीं। हाथ की लकीरें तो सिर्फ त्वचा की सिलवटें हैं। असली किस्मत उन लकीरों में नहीं, बल्कि तुम्हारे पसीने और मेहनत में होती है। याद रखना, किस्मत उनकी भी होती है जिनके हाथ नहीं होते।”
विशाल को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने समझ लिया कि वह बेवकूफी में अपनी किस्मत को कोस रहा था, जबकि असली शक्ति उसके संकल्प में थी। उस दिन उसने कसम खाई कि अब वह लकीरों पर नहीं, अपने कर्मों पर भरोसा करेगा।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, आपकी हथेली की लकीरें बदलती रहती हैं। आप जितनी मेहनत करेंगे, आपकी किस्मत की लकीरें उतनी ही गहरी और पक्की होती जाएंगी। भाग्य पहले से लिखा हुआ कोई दस्तावेज़ नहीं है; यह एक किताब है जिसे आप रोज़ अपने कर्मों की कलम से लिखते हैं। अगर कोई बिना हाथों के सफल हो सकता है, तो आपके पास तो सब कुछ है। कमी शरीर या किस्मत में नहीं, इच्छाशक्ति में होती है।








