धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—811

एक बार एक प्रसिद्ध मूर्तिकार मूर्ति बनाने के लिए जंगल से पत्थर ढूंढने गया। वहां उसे एक बहुत ही सुंदर और चिकना पत्थर दिखाई दिया।

मूर्तिकार ने सोचा, “यह पत्थर मूर्ति बनाने के लिए एकदम सही है।”

वह उस पत्थर को अपने कार्यशाला में लाया। उसने अपने औज़ार—छेनी और हथौड़ी निकाले और पत्थर को तराशना शुरू किया।

जैसे ही हथौड़ी की पहली चोट पत्थर पर पड़ी, पत्थर के अंदर से आवाज़ आई: “रुको! रुको! मुझे मत मारो। मुझे बहुत दर्द हो रहा है। मैं यह चोट बर्दाश्त नहीं कर सकता। मुझे छोड़ दो!”

मूर्तिकार ने देखा कि पत्थर दर्द से तड़प रहा है। वह एक दयालु इंसान था। उसने सोचा कि जबरदस्ती करने से पत्थर टूट जाएगा। उसने उस पत्थर को छोड़ दिया और उसे एक कोने में रख दिया।

फिर उसने पास पड़ा एक दूसरा पत्थर उठाया।

मूर्तिकार ने उस पर भी हथौड़ी और छेनी से वार करना शुरू किया। उसे भी दर्द हुआ, लेकिन उस दूसरे पत्थर ने उफ्फ तक नहीं की। उसने खुद को मूर्तिकार के हवाले कर दिया। उसे लगा कि यह दर्द उसे तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि उसे सुंदर बनाने के लिए दिया जा रहा है।

मूर्तिकार ने लगातार कई दिनों तक उस पत्थर को तराशा, उसे घिसा और काटा। अंत में, वह साधारण पत्थर एक अद्भुत भगवान की मूर्ति में बदल गया।

कुछ समय बाद, गाँव के लोग उस मूर्ति को लेने आए ताकि उसे मंदिर में स्थापित किया जा सके।

जब वे मूर्ति ले जाने लगे, तो उनकी नज़र कोने में पड़े उस पहले पत्थर (जिसने दर्द सहने से मना कर दिया था) पर पड़ी। उन्होंने मूर्तिकार से कहा, “हमें मंदिर के बाहर नारियल फोड़ने के लिए एक मजबूत पत्थर की भी ज़रूरत है। क्या हम इसे ले जा सकते हैं?” मूर्तिकार ने कहा, “हाँ, ले जाइए, यह मेरे किसी काम का नहीं।”

अब मंदिर में दोनों पत्थर पहुँच गए।

दूसरा पत्थर (जो मूरत बना): उसे मंदिर के गर्भगृह में ऊंचे आसन पर रखा गया। लोग उसकी पूजा करने लगे, फूल चढ़ाने लगे और दूध से नहलाने लगे।

पहला पत्थर (जो कच्चा रह गया): उसे मंदिर के दरवाजे के बाहर जमीन में गाड़ दिया गया। आने-जाने वाले लोग उस पर पैर रखकर गुजरते और जोर-जोर से उस पर नारियल फोड़ते।

एक रात, जब मंदिर खाली था, तो बाहर वाले पत्थर ने अंदर वाली मूर्ति से रोते हुए पूछा: “भाई, हम दोनों एक ही पहाड़ से आए थे, एक ही जैसे थे। फिर तुम्हारी किस्मत इतनी अच्छी और मेरी इतनी खराब क्यों? तुम पूजे जाते हो और मैं रोज ठोकरें खाता हूँ।”

अंदर की मूर्ति (दूसरे पत्थर) ने मुस्कुराते हुए बहुत सुंदर जवाब दिया: “याद है? जब मूर्तिकार ने तुम्हें तराशने की कोशिश की थी, तो तुमने दर्द से डरकर मना कर दिया था। तुमने उस समय के थोड़े से दर्द से बचने का आसान रास्ता चुना। मैंने उस दर्द को ‘स्वीकार’ किया और उसे मुझे तराशने दिया।”

मूर्ति ने आगे कहा: “मित्र! चूँकि तुमने तराशे जाने का दर्द नहीं सहा, इसलिए अब तुम्हें जीवन भर हर किसी का दर्द और चोट सहनी पड़ेगी। मैंने एक बार तराशे जाने का कष्ट सहा, इसलिए अब मैं पूजनीय हूँ।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जीवन में दर्द तो मिलेगा ही। चुनाव आपका है—या तो “अनुशासन और मेहनत” का दर्द सहकर ‘मूरत’ बन जाओ, या फिर “पछतावे और असफलता” का दर्द सहकर ‘सीढ़ी का पत्थर’ बन जाओ। जब जीवन आपको कठिन परिस्थितियों में डालता है, तो समझ लीजिए कि ईश्वर रूपी मूर्तिकार आपको तराश रहा है। वह आपको तोड़ना नहीं चाहता, वह आपको ‘मास्टरपीस’ बना रहा है। बिना घिसे तो हीरा भी नहीं चमकता। आपकी कीमत तभी बढ़ती है जब आप संघर्ष की आग से होकर गुजरते हैं।

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