धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 851

एक बार एक नगर में आदित्य नाम का युवक रहता था। वह बहुत बुद्धिमान था, लेकिन उसकी एक कमजोरी थी—उसकी इच्छाएँ कभी खत्म नहीं होती थीं। उसे हर चीज चाहिए होती थी—धन, प्रतिष्ठा, सुख-सुविधाएँ… और अगर कुछ न मिले, तो वह बेचैन और दुखी हो जाता।

एक दिन उसकी मुलाकात एक संत से हुई। आदित्य ने पूछा, “गुरुदेव, मेरे जीवन में इतने संघर्ष क्यों हैं? मैं हमेशा परेशान क्यों रहता हूँ?”

संत मुस्कुराए और उसे पास के जंगल में ले गए। वहाँ एक छोटा-सा तालाब था। संत ने कहा, “इस पानी में अपना चेहरा देखो।”

आदित्य ने देखा—पानी बिल्कुल शांत था, उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

फिर संत ने पानी में एक पत्थर फेंका। लहरें उठने लगीं, और चेहरा धुंधला हो गया।

संत बोले, “यह तालाब तुम्हारा मन है। जब तक इच्छाएँ शांत रहती हैं, तब तक जीवन स्पष्ट और सुखद दिखता है। लेकिन जब इच्छाएँ अनियंत्रित हो जाती हैं, तो मन में अशांति की लहरें उठती हैं—और वही संघर्ष बन जाती हैं।”

आदित्य ने पूछा, “तो क्या इच्छाएँ रखना गलत है?”

संत ने उत्तर दिया, “नहीं, इच्छाएँ रखना गलत नहीं है। लेकिन उनका दास बन जाना गलत है। जिस व्यक्ति का अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण होता है, वही संघर्षों को भी सहजता से पार कर लेता है। और जो इच्छाओं का गुलाम बन जाता है, उसके लिए छोटी-छोटी बातें भी बड़ी परेशानी बन जाती हैं।”

उस दिन आदित्य ने एक संकल्प लिया—वह अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करेगा, न कि उनके पीछे भागेगा। धीरे-धीरे उसका जीवन बदलने लगा। संघर्ष तो आए, लेकिन अब वे उसे तोड़ नहीं पाते थे।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जीवन के संघर्ष बाहर से नहीं, भीतर की अनियंत्रित इच्छाओं से पैदा होते हैं। जिसने इच्छाओं पर नियंत्रण पा लिया, उसने जीवन को जीत लिया।

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Jeewan Aadhar Editor Desk