धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 852

एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा, “गुरुजी, यदि परमात्मा हमसे प्रेम करता है, तो वह हमारे जीवन में इतने कष्ट क्यों भेजता है?”

गुरु मुस्कुराए और उसे एक कुम्हार के पास ले गए। कुम्हार मिट्टी को गूँथ रहा था, उसे पीट रहा था और फिर उसे चाक पर घुमाकर आकार दे रहा था। उसके बाद उसने उस कच्चे घड़े को आग की तेज भट्टी में डाल दिया।

गुरु ने शिष्य से कहा, “देखो, यह कुम्हार इस मिट्टी को कितने कष्ट दे रहा है। लेकिन क्या वह ऐसा इसलिए कर रहा है क्योंकि उसे मिट्टी से शत्रुता है? नहीं। वह उसे इसलिए पीट रहा है और आग में तपा रहा है ताकि वह घड़ा मजबूत बन सके। यदि वह उसे आग के ‘कष्ट’ से नहीं गुज़ारेगा, तो घड़ा पानी की एक बूँद भी नहीं सँभाल पाएगा और पहली ही चोट में टूट जाएगा।”

गुरु ने आगे समझाया, “परमात्मा भी उस कुम्हार की तरह है। वह हमें कष्टों की भट्टी में इसलिए डालता है ताकि हम भीतर से मजबूत बन सकें। वह हमें केवल आग में नहीं छोड़ता, बल्कि जब हम तप कर तैयार हो जाते हैं, तो वह हमें उस कष्ट के पार ले जाकर एक नया, मजबूत और उपयोगी स्वरूप भी देता है।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, कठिनाइयाँ हमारे जीवन में हमें तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि हमारी आंतरिक शक्ति को जगाने और हमें निखारने के लिए आती हैं।

Shine wih us aloevera gel

Related posts

ओशो : भीतर जले दीपक

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 736

Jeewan Aadhar Editor Desk

स्वामी राजदास : पकड़ छोड़कर तो देखो