एक समय की बात है। एक राज्य था, जो सोने की चमक से जगमगाता था। महल स्वर्ण के, द्वार स्वर्ण के, यहाँ तक कि सड़कें भी सोने से मढ़ी हुई थीं। उस राज्य का राजा अत्यंत शक्तिशाली था, पर उससे भी अधिक उसका अहंकार विशाल था।
राजा को लगता था कि उसकी लंका जैसी समृद्धि के सामने कोई टिक नहीं सकता। वह अक्सर कहा करता— “मेरे वैभव के सामने दुनिया का हर सत्य छोटा है।”
एक दिन एक संत उस राज्य में आए। साधारण वेश, शांत चेहरा, और आँखों में गहरी करुणा। उन्होंने राजा से कहा— “राजन, तुम्हारी लंका कितनी ही स्वर्णमयी क्यों न हो, पर यदि उसमें मर्यादा का दीप नहीं जलेगा, तो यह सब एक दिन राख हो जाएगा।”
राजा हँस पड़ा— “एक छोटा सा दीप मेरी स्वर्ण लंका को कैसे चुनौती दे सकता है?”
संत ने शांत स्वर में उत्तर दिया— “दीप छोटा होता है, पर अंधकार को समाप्त करने की शक्ति रखता है। मर्यादा भी ऐसी ही है—छोटी दिखती है, पर अहंकार के साम्राज्य को खत्म कर देती है।”
राजा ने इसे मज़ाक समझकर संत को जाने दिया।
समय बीता… राजा का अहंकार बढ़ता गया। उसने नियम तोड़ने शुरू कर दिए, दूसरों का अपमान करने लगा, और अपनी शक्ति का दुरुपयोग करने लगा।
धीरे-धीरे उसके अपने ही लोग उससे दूर होने लगे। विश्वास टूट गया, संबंध बिखर गए। और एक दिन, वही स्वर्णमयी लंका भीतर से खोखली होकर गिर पड़ी।
राजा अकेला रह गया—न वैभव काम आया, न शक्ति।
उसी समय उसे संत की बात याद आई— “मर्यादा का एक दीप ही अहंकार की लंका को मिटा सकता है।”
वह पश्चाताप से भर गया और समझ गया कि असली शक्ति सोने में नहीं, संयम और मर्यादा में होती है।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, अहंकार चाहे कितना भी चमकदार क्यों न हो, वह हमेशा मर्यादा, विनम्रता और सत्य के सामने टिक नहीं सकता। जीवन में यदि स्थायी सम्मान चाहिए, तो भीतर मर्यादा का दीप जलाना ही होगा।








