धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 855

प्राचीन काल की बात है, एक सिद्ध संत अपने आश्रम में शिष्यों को जीवन के गूढ़ रहस्य समझा रहे थे। उनके पास कई शिष्य शिक्षा ग्रहण करते थे, जिनमें से दो शिष्य, देवव्रत और सोमदत्त, अपनी पढ़ाई पूरी करने के कगार पर थे।

आश्रम से विदा करने से पहले, संत ने दोनों की अंतिम परीक्षा लेने का निश्चय किया।

संत ने दोनों को अपने पास बुलाया और कहा, “पुत्रों, तुम्हारी शिक्षा लगभग पूरी हो चुकी है, लेकिन एक अंतिम कार्य शेष है। आश्रम से पचास कोस दूर एक पवित्र गुफा है, जहाँ एक दुर्लभ जड़ी-बूटी खिलती है जो केवल आज सूर्यास्त के समय ही तोड़ी जा सकती है। तुम दोनों को अलग-अलग रास्तों से वहाँ जाना है और वह जड़ी-बूटी लानी है। जो इस कार्य में सफल होगा, वही मेरी शिक्षा का सच्चा उत्तराधिकारी कहलाएगा।”

दोनों शिष्यों ने गुरु का आशीर्वाद लिया और अपनी-अपनी राह पर निकल पड़े।

देवव्रत जिस रास्ते से जा रहा था, वह एक बड़े और समृद्ध नगर से होकर गुजरता था। नगर में उस दिन एक बहुत बड़ा उत्सव चल रहा था। चारों ओर स्वादिष्ट व्यंजनों की सुगंध, मधुर संगीत और तरह-तरह के खेल-तमाशे हो रहे थे। देवव्रत उत्सव की चकाचौंध देखकर रुक गया। उसने सोचा, “थोड़ी देर यह उत्सव देख लेता हूँ, फिर अपनी यात्रा पर निकल पडूंगा। सूर्यास्त होने में अभी बहुत समय है।”

उत्सव के आनंद में वह इतना खो गया कि उसे समय का भान ही नहीं रहा। जब उसे होश आया, तो सूर्य ढलने लगा था। वह भागते हुए गुफा की ओर गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सूर्यास्त हो चुका था और जड़ी-बूटी मुरझा गई थी।

दूसरी ओर, सोमदत्त का रास्ता एक घने जंगल और एक छोटे गाँव से होकर जाता था। रास्ते में उसे एक व्यक्ति मिला जिसने उसे सोने के सिक्कों से भरा एक थैला दिखाया और कहा, “अगर तुम आज का दिन मेरे यहाँ रुक कर मेरे खेत का हिसाब-किताब कर दो, तो यह सारा धन तुम्हारा हो जाएगा।”

यह एक बहुत बड़ा प्रलोभन था। सोमदत्त के मन में एक पल के लिए विचार आया कि इतने धन से उसका पूरा जीवन सुख से कट जाएगा। लेकिन अगले ही पल उसे अपने गुरु का आदेश और अपना लक्ष्य याद आ गया। उसने उस व्यक्ति से विनम्रतापूर्वक कहा, “क्षमा करें, इस समय मेरे लिए मेरे गुरु का कार्य और मेरा लक्ष्य इस धन से कहीं अधिक मूल्यवान है।”

सोमदत्त बिना रुके आगे बढ़ता रहा। रास्ते में उसे प्यास लगी, थकान हुई, आराम करने का मोह भी हुआ, लेकिन वह हर प्रलोभन को नकारता हुआ निरंतर चलता रहा। अंततः, ठीक सूर्यास्त से पहले वह उस पवित्र गुफा तक पहुँच गया और उसने सफलता पूर्वक वह दुर्लभ जड़ी-बूटी प्राप्त कर ली।

जब सोमदत्त जड़ी-बूटी लेकर आश्रम लौटा, तो गुरु ने उसे गले लगा लिया। देवव्रत भी खाली हाथ, सिर झुकाए वहां खड़ा था।

तब संत ने मुस्कुराते हुए अपने सभी शिष्यों को संबोधित करते हुए वह महान सीख दी: “जब हम किसी काम में आगे बढ़ते हैं, तब रास्ते में कई बार अलग—अलग प्रलोभन मिलते हैं— कभी धन का, कभी आराम का, तो कभी क्षणिक सुखों का। जो व्यक्ति इन प्रलोभनों में उलझ जाता है, वह अपने मार्ग से भटक जाता है। हमें उन प्रलोभनों से बचना चाहिए—तभी हमारे लक्ष्य पूरे हो सकते हैं।”

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