एक बार एक जिज्ञासु युवक एक ज्ञानी संत के आश्रम में पहुँचा। वह संत एक ऊँचे पहाड़ पर बनी छोटी सी कुटिया में बिल्कुल अकेले रहते थे। न उनके पास कोई विशेष सुख-सुविधा थी, न कोई सेवक, और न ही बात करने के लिए कोई संगी-साथी। फिर भी, संत के चेहरे पर एक गज़ब का तेज और सदा बनी रहने वाली एक शांत मुस्कान थी।
युवक से रहा नहीं गया। उसने संत से पूछ ही लिया, “महाराज! मैं देखता हूँ कि दुनिया के लोग अपनों के बीच, भीड़ में और तमाम सुख-सुविधाओं में रहकर भी दुखी और तनावग्रस्त हैं। लेकिन आप यहाँ इस घने जंगल में बिल्कुल अकेले हैं, फिर भी इतने आनंद में कैसे रहते हैं? क्या आपको कभी अकेलेपन से डर या उदासी नहीं महसूस होती?”
संत मुस्कुराए। उन्होंने कोई सीधा उत्तर देने के बजाय युवक को अपने साथ एक शांत सरोवर के पास चलने का इशारा किया। संत ने एक बर्तन में सरोवर का थोड़ा सा पानी भरा और उसमें मुट्ठी भर मिट्टी डाल दी। फिर एक लकड़ी से उस पानी को ज़ोर से घुमाया। पानी पूरी तरह गंदा और मटमैला हो गया।
संत ने उस बर्तन को ज़मीन पर रखते हुए कहा, “बेटा, अब इस पानी को ध्यान से देखते रहो।”
युवक शांत बैठकर उस मटमैले पानी को देखने लगा। धीरे-धीरे पानी के अंदर की हलचल कम होने लगी। कुछ ही समय में सारी मिट्टी बर्तन की तलहटी में बैठ गई और ऊपर का पानी बिल्कुल शीशे की तरह साफ़ और पारदर्शी हो गया। उसमें युवक को अपना ही चेहरा साफ़ दिखाई देने लगा।
अब संत ने अत्यंत मधुर स्वर में कहा, “बेटा, ठीक यही हमारे मन की स्थिति है। जब हम लगातार भीड़, शोर और दुनिया की भागदौड़ में घिरे होते हैं, तो हमारा मन इस घुमाए गए मटमैले पानी की तरह अशांत रहता है। हम दूसरों के विचारों, अपेक्षाओं और भौतिक दौड़ में उलझे रहते हैं और खुद को खो देते हैं।”
संत ने आगे कहा, “लेकिन जब हम अकेले रहने की कला सीख लेते हैं, तो हमारे मन की सारी उथल-पुथल शांत हो जाती है। हमारे भीतर का सारा शोर और विकार नीचे बैठ जाता है। तब हमारा मन इस साफ़ पानी की तरह निर्मल हो जाता है और हमें अपने ‘वास्तविक स्वरूप’ के दर्शन होते हैं।”
अपनी बात पूरी करते हुए संत ने उस युवक को जीवन का सबसे बड़ा रहस्य समझाया:”अकेलापन एक दुख है, जिसमें इंसान को दूसरों की कमी खलती है। लेकिन एकांत एक परम आनंद है, जिसमें इंसान खुद से मुलाकात करता है। सबसे ज्यादा आनंद उसी को मिलता है जो इस एकांत में स्वयं के साथ खुश रहना सीख लेता है, क्योंकि तब उसकी खुशी किसी बाहरी व्यक्ति या वस्तु की मोहताज नहीं रह जाती।”
युवक को जीवन का गहरा सत्य समझ आ चुका था। वह जान गया था कि बाहर की भीड़ से कटकर अपने भीतर की शांति से जुड़ना ही सबसे बड़ा आनंद है।








