वन की शांति में खड़े हनुमान जी एक ऊंचे पर्वत को देख रहे थे। उनके मन में एक ही लक्ष्य था- माता सीता की खोज। लंबी यात्रा के बाद वे लंका पहुंचे थे, लेकिन असली चुनौती अब शुरू होने वाली थी।
हनुमान जी ने बिना समय गंवाए पर्वत पर चढ़ना शुरू किया। जैसे-जैसे वे ऊपर पहुंचते गए, उनके सामने लंका का अद्भुत दृश्य खुलता गया। पूरी लंका सोने से चमक रही थी। उसके परकोटे ऐसे दमक रहे थे जैसे सूरज की किरणें उनमें बस गई हों। अंदर सुंदर भवन, चौड़े रास्ते, चौराहे, बाजार, रथ, हाथी और घोड़े- सब कुछ अत्यंत भव्य दिखाई दे रहा था।
इस चमक-दमक के पीछे एक डरावना सच भी छिपा था। लंका की रक्षा भयानक राक्षस कर रहे थे। उनके रूप इतने डरावने थे कि किसी का भी मन कांप जाए। वे निर्दयता से मनुष्यों और पशुओं को खा रहे थे। यह दृश्य किसी को भी भयभीत कर सकता था।
एक पल के लिए कोई भी सोच सकता था कि अब आगे बढ़ना मुश्किल है, लेकिन हनुमान जी के मन में डर का कोई स्थान नहीं था। उन्होंने शांत मन से सोचा- “अगर मैं अपने असली रूप में जाऊंगा, तो ये मुझे देख लेंगे और युद्ध शुरू हो जाएगा। इससे मेरा उद्देश्य पूरा नहीं होगा।”
यह सोचकर उन्होंने अपने विशाल शरीर को छोटा कर लिया- इतना छोटा कि वे मच्छर के समान हो गए। अब वे बिना किसी की नजर में आए लंका में प्रवेश कर सकते थे।
अपने इस छोटे रूप में हनुमान जी ने भगवान राम का स्मरण किया और चुपचाप लंका में प्रवेश कर गए। उनका लक्ष्य स्पष्ट था, मन स्थिर था। इस तरह बुद्धिमानी, धैर्य और सही निर्णय के साथ उन्होंने अपनी यात्रा का अगला कदम बढ़ाया।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जब परिस्थितियां कठिन होती हैं, तो डर लगना स्वाभाविक है, लेकिन अगर हम डर के कारण रुक जाएं, तो हम आगे नहीं बढ़ पाएंगे। जीवन में भी कठिन हालात आएंगे, लेकिन हमें साहस बनाए रखना चाहिए।








