एक छोटे से गाँव में एक संत रहते थे। उनके पास लोग अपनी उलझनों का समाधान पाने आते थे। एक दिन एक किसान उनके पास पहुँचा, जो भविष्य की चिंता में डूबा हुआ था।
उसने कहा—
“गुरुदेव, अगर इस बार फसल खराब हो गई तो मेरा क्या होगा? परिवार कैसे चलेगा? मैं हर समय इसी चिंता में रहता हूँ।”
संत ने उसे अपने साथ खेत में चलने को कहा।
संत ने किसान से पूछा— “जब तुम बीज बोते हो, तो क्या हर समय यह सोचते रहते हो कि कल ही फसल आ जाएगी?”
किसान बोला— “नहीं गुरुदेव, मैं तो बस सही समय पर बीज बोता हूँ, पानी देता हूँ और देखभाल करता हूँ। फसल तो समय आने पर ही उगती है।”
संत मुस्कुराए और बोले— “फिर जीवन में ऐसा क्यों नहीं करते? तुम्हारा काम बीज बोना है—यानी आज मेहनत करना। फसल—यानी भविष्य—अपने समय पर ही आएगी।”
किसान थोड़ा शांत हुआ, लेकिन संत ने आगे समझाया— “अगर तुम हर दिन बीज खोदकर यह देखने लगो कि वह उगा या नहीं, तो क्या होगा?”
किसान हँसते हुए बोला—“बीज तो खराब हो जाएगा, कभी नहीं उगेगा।”
तब संत ने गहरी बात कही— “ठीक इसी तरह, बार-बार भविष्य की चिंता करना उसी बीज को खोदने जैसा है। यह तुम्हारी मेहनत और शांति—दोनों को नष्ट कर देता है।”
“बीज बोने पर ध्यान दो, फसल की चिंता मत करो—वह समय पर अवश्य आएगी।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, वर्तमान में किया गया कर्म ही भविष्य की नींव बनता है। अधीरता और चिंता परिणाम को कमजोर कर देती है। धैर्य और निरंतर प्रयास ही सफलता का मार्ग हैं। जीवन एक खेत की तरह है—
आज का कर्म ही कल की फसल बनता है।








