धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 886

पुराने समय में एक गरीब करीब किसान हमेशा संघर्ष और चिंताओं में घिरा रहता था। वह दिन-रात मेहनत करता, लेकिन फिर भी उसकी जरूरतें पूरी नहीं हो पाती थीं। गरीबी के कारण उसका मन हमेशा बेचैन रहता था और वह अपने जीवन से बहुत असंतुष्ट था।

एक दिन उसके गांव में एक प्रसिद्ध संत आए। किसान ने सोचा कि शायद संत उसकी समस्या का कोई समाधान दे सकते हैं। वह संत के पास गया और अपनी सारी परेशानियां विस्तार से बता दीं। संत ने उसकी बात ध्यान से सुनी और उसे एक विशेष मंत्र दिया। साथ ही उन्होंने उस मंत्र को जपने की विधि भी समझाई।

किसान ने संत के बताए अनुसार नियमित रूप से मंत्र जप शुरू कर दिया। कुछ ही दिनों में उसकी भक्ति और श्रद्धा से प्रसन्न होकर उसके सामने एक देवी प्रकट हुईं। देवी ने कहा कि मैं तुम्हारी भक्ति से खुश हूं, तुम जो चाहे वरदान मांग सकते हो।

किसान अचानक आए इस अवसर से हैरान रह गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि उसे क्या मांगना चाहिए। उसने देवी से कहा कि वह अगले दिन अपना वरदान मांगेगा। देवी उसकी बात मानकर गायब हो गईं।

अब किसान के मन में तरह-तरह के विचार आने लगे। वह सोचने लगा कि उसके पास अच्छा घर नहीं है, इसलिए उसे घर मांग लेना चाहिए। फिर उसे लगा कि जमींदार बनना बेहतर होगा। कुछ देर बाद उसने सोचा कि जमींदार से भी बड़ा तो राजा होता है, इसलिए राजा बनने का वरदान मांगना चाहिए।

इसी उलझन में पूरा दिन निकल गया। रात भर वह सो नहीं सका। उसका मन कभी एक इच्छा पर टिकता, कभी दूसरी पर। ऐसे ही सोच-विचार करते हुए सुबह हो गई। सुबह होते ही उसके सामने देवी फिर प्रकट हुईं और वरदान मांगने को कहा।

किसान ने विनम्रता से कहा कि उसे ऐसा वरदान चाहिए जिससे उसका मन हमेशा भगवान की भक्ति में लगा रहे और वह हर परिस्थिति में संतुष्ट रह सके। देवी ने “तथास्तु” कहा और गायब हो गईं।

ये बात उस संत को मालूम हुई, जिसने उसे मंत्र दिया था। संत किसान के पास पहुंचे और उससे पूछा कि तुमने देवी से धन-संपत्ति क्यों नहीं मांगी।

किसान ने उत्तर दिया कि धन की इच्छा ने ही मैं बेचैन हो गया था, इसलिए मैंने सोचा कि जो धन अभी आया नहीं है, उसके आने के ख्याल से ही मैं बैचेन हो गया हूं, मुझे तो जीवन में शांति चाहिए, इसलिए मैंने देवी से वरदान में भक्ति मांगी है।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जीवन में असंतोष ही अधिकांश तनावों की जड़ है। जब व्यक्ति अपने पास जो है उसमें संतुष्ट नहीं होता, तो वह हमेशा अधिक पाने की दौड़ में मानसिक शांति खो देता है। संतोष का अर्थ प्रगति रोकना नहीं है, बल्कि वर्तमान को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ना है।

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