धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 890

एक गांव में एक साधु रोज भिक्षा मांगने आया करता था। वह शांत स्वभाव का और बहुत विद्वान था। हर घर से थोड़ा-थोड़ा लेकर आगे बढ़ जाता था। एक दिन वह एक महिला के घर पहुंचा। महिला ने साधु को भिक्षा देने से पहले कहा, “महाराज, आज आप मुझे कोई ज्ञान की बात सुनाइए, तभी मैं भिक्षा दूंगी।”

साधु मुस्कराया और बोला, “आज नहीं, कल बताऊंगा।” इतना कहकर वह बिना भिक्षा लिए वहां से चला गया।

अगले दिन वह फिर उसी घर पहुंचा। उस दिन महिला ने स्वादिष्ट खीर बनाई थी। वह सोच रही थी कि आज साधु से ज्ञान भी मिलेगा और सेवा भी हो जाएगी। जैसे ही साधु पहुंचा, महिला ने आदरपूर्वक खीर का कटोरा आगे किया।

साधु ने अपना कमंडल उसके सामने रख दिया और कहा, “इसमें डाल दीजिए।” महिला जैसे ही खीर डालने लगी, उसने देखा कि कमंडल अंदर से बहुत गंदा था। उसमें धूल, मिट्टी और कचरा भरा हुआ था।

महिला ने तुरंत कहा, “महाराज, यह कमंडल तो बहुत गंदा है। इसमें खीर डाल दी तो पूरी खीर खराब हो जाएगी।”

साधु ने शांत स्वर में कहा, “आप चिंता न करें, इसमें खीर डाल दें।”

महिला ने मना कर दिया, “नहीं महाराज, पहले इसे साफ करना पड़ेगा। मैं इसे धो देती हूं।”

साधु ने पूछा, “अगर धोकर इसमें खीर डालेंगी तो क्या होगा?”

महिला बोली, “तब खीर खराब नहीं होगी, इसे खाया जा सकेगा।”

तब साधु ने कहा, “यही तो वह ज्ञान है जो मैं आपको देने आया हूं।”

उसने आगे कहा, “जिस तरह गंदे कमंडल में खीर नहीं डाली जा सकती, उसी तरह अशुद्ध और अशांत मन में ज्ञान नहीं ठहर सकता। आपके मन में अहंकार, शक, अशांति और पूर्वाग्रह जैसी बुराइयां भरी हैं, इसलिए आपको पहले इन बुराइयों को छोड़ना होगा।”

साधु ने समझाया, “पहले हमें अपने मन को साफ करना चाहिए, फिर ज्ञान अपने आप उसमें स्थान ले लेता और हमारा जीवन बदल जाता है।”

यह सुनकर महिला ने अपनी बुराइयां छोड़ने का संकल्प लिया। उसने साधु से क्षमा मांगी और उस दिन उसने सीखा कि बाहरी शुद्धता से ज्यादा मन की शुद्धता जरूरी है।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जैसे गंदे बर्तन में भोजन भी खराब हो जाता है, वैसे ही अशुद्ध मन में अच्छा ज्ञान भी असर नहीं दिखाता है। इसलिए सबसे पहले अपने विचारों को साफ और सकारात्मक बनाना जरूरी है।

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