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ओशो : नियम बदलते हैं

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पश्चिम में तुम देखते हो,नग्र क्लब बन रहे हैं। उनकी संख्या बढ़ती जा रही है। और उसका भौलिक मनोवैज्ञानिक कारण?- क्योंकि बच्चों को हम जबरदस्ती कपड़े पहना देते हैं। जब वे नंगे होना चाहते थे,कपड़े पहना दिए। बच्चा भाग रहा है,और मां उसको कपड़े पहना रही है। वह कह रहा है कि मुझे गरमी लग रही है,मगर मां कह रही है :घर में मेहमान आए हुए है। बच्चे को समझ में नहीं आता कि मेहमानों से और कपड़े का क्या लेना-देना हैं? वह कहता है:मुझे बगीचे में जाने दो। वह नंगा ही बगीचे में जाना चाहता है।
लेकिन छोटे-छोटे बच्चों को हम जबरदस्ती कपड़े थोप देते हैं। फिर जिंदगी-भर कपड़े उनको एक तरह का बोझ होते हैं। जहां भी उन्हें मौका मिल जाएगा,जब भी मिल जाएगा,वे कपड़े उतार देना चाहेंगे। फिर इससे हजार विकृतियां पैदा होती हैं। हजार विकृतियां पैदा होती है। वे अपने कपड़े उतार देना चाहते है। वे दूसरों के भीतर कपड़े उतारते रहते हैं- मानसिक रूप से।
तुमने देखा? जब तुम रास्ते से गुजरते हो, एक सुंदर स्त्री गई,तुम तत्क्षण उसके कपड़े उतार लेते हो भीतर। तुम्हारे दिमाग में,जल्दी से तुम सब कपड़े अलग कर देते हो। तुम उस नग्र देखना चाहते हो। कैसा पागलपन हैं? इसका क्या अर्थ हैं? इसका अर्थ है:जो बचपन में हो जाना था वह नहीं हो पाया।
और यही आध्यात्मिक विकास में भी स्मण रखना। जीवित रखना। जीवित के नियम समान हैं। तल बदलते हैं,नियम बदलते हैं। जब विधियों की जरूरत हैं,तब विधियां पूरी कर लेना,नहीं तो वे अटकी रह जाएंगी।
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