पुराने समय की लोक कथा है। किसी राज्य में एक डाकू और एक संत रहते थे। दोनों का जीवन बिल्कुल अलग था। डाकू ने पूरी जिंदगी लूटपाट, हिंसा और पाप में बिताई थी, जबकि संत ने अपना जीवन तप, पूजा और भक्ति में लगाया था। संयोग से एक ही दिन दोनों की मृत्यु हो गई और दोनों का अंतिम संस्कार भी एक ही श्मशान घाट पर हुआ।
मृत्यु के बाद दोनों की आत्माएं यमलोक भी साथ ही पहुंचीं। वहां यमराज ने उनके कर्मों का लेखा-जोखा देखा और दोनों से कहा, “अगर आप अपने कर्मों के बारे में कुछ कहना चाहते हैं, तो कह सकते हैं।”
डाकू हाथ जोड़कर विनम्र स्वर में बोला, “प्रभु, मैं जानता हूं कि मैंने जीवनभर पाप किए हैं। मैंने कई लोगों को दुख पहुंचाया। मुझे अपने कर्मों पर पछतावा है। आप जो भी दंड देंगे, मैं उसे सहर्ष स्वीकार करूंगा।”
इसके बाद संत बोले, “महाराज, मैंने जीवनभर भगवान की भक्ति की है। तपस्या की है। मैंने कभी कोई गलत काम नहीं किया। इसलिए मुझे स्वर्ग का अधिकारी माना जाना चाहिए।”
यमराज ने दोनों की बातें ध्यान से सुनीं। फिर उन्होंने डाकू से कहा, “अब से तुम्हें इस संत की सेवा करनी होगी, यही तुम्हारा दंड है।”
डाकू ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार कर ली, लेकिन यह सुनते ही संत क्रोधित हो गए। उन्होंने नाराज होकर कहा, “महाराज! यह पापी और अपवित्र व्यक्ति मेरी सेवा करेगा? इसने जीवनभर अधर्म किया है। इसका स्पर्श भी मुझे अपवित्र कर देगा।”
संत की बातें सुनकर यमराज गंभीर हो गए। उन्होंने कहा, “डाकू ने जीवनभर पाप किए, लेकिन मृत्यु के बाद उसके भीतर विनम्रता और पश्चाताप जाग गया। वह सेवा करने के लिए भी तैयार है। जबकि आपने पूरी जिंदगी तपस्या की, फिर भी आपके भीतर अहंकार भरा हुआ है। आपकी भक्ति अधूरी है, क्योंकि सच्ची भक्ति व्यक्ति को विनम्र बनाती है, अहंकारी नहीं।”
इसके बाद यमराज ने कहा, “अब आप इस डाकू की सेवा करोगे। यही आपकी सजा है।”
संत यह सुनकर मौन हो गए। उस दिन उन्हें समझ आया कि केवल अच्छे कर्म ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि अच्छे स्वभाव और विनम्रता का होना भी जरूरी है।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, अक्सर लोग अच्छे काम तो करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे उन कामों पर गर्व करने लगते हैं। यही गर्व धीरे-धीरे अहंकार में बदल जाता है और व्यक्ति की सारी अच्छाइयों को खत्म कर देता है। जीवन को सफल और संतुलित बनाने के लिए विनम्रता सबसे जरूरी गुण है।








