धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—799

पुराने समय की बात है, पहाड़ों के बीच स्थित एक आश्रम में एक महात्मा जी रहते थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। एक दिन, सुमित नाम का एक युवक हताश होकर उनके पास आया। सुमित ने व्यापार में तीन बार कोशिश की थी, और तीनों बार वह बुरी तरह असफल हुआ था। उसका सब कुछ लुट चुका था और वह हार मान चुका था।

सुमित ने महात्मा जी के चरणों में गिरकर कहा, “गुरुवर, मैं एक हारा हुआ इंसान हूँ। मैं जिस काम में हाथ डालता हूँ, गिर जाता हूँ। लोग मेरा मजाक उड़ाते हैं। अब मुझमें उठने की हिम्मत नहीं बची। मुझे लगता है मेरा जीवन व्यर्थ है।”

महात्मा जी मुस्कुराए और बोले, “बेटा, आज शाम को तुम मेरे साथ पहाड़ी की चोटी पर स्थित मंदिर चलना। वहीँ तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूँगा।”

शाम हुई, लेकिन मौसम अचानक खराब हो गया। बारिश होने लगी और पहाड़ी का रास्ता बहुत फिसलन भरा हो गया।

महात्मा जी और सुमित ने चढ़ाई शुरू की। रास्ता कीचड़ से भरा था। अभी वे कुछ दूर ही गए थे कि सुमित का पैर फिसला और वह कीचड़ में ओंधे मुँह गिर गया। उसके कपड़े गंदे हो गए और घुटने में चोट लग गई।

सुमित को बहुत शर्म महसूस हुई। उसने सोचा, “एक तो मैं जीवन में हारा हुआ हूँ, और अब यहाँ गुरुजी के सामने भी गिर गया।” वह वहीं कीचड़ में बैठा रहा और उठने का नाम नहीं लिया।

महात्मा जी कुछ कदम आगे गए, फिर रुके और पीछे मुड़कर देखा। उन्होंने सुमित को हाथ बढ़ाकर नहीं उठाया, बल्कि गंभीर स्वर में पूछा: “सुमित, तुम कीचड़ में क्यों बैठे हो?”

सुमित ने रोते हुए कहा, “गुरुवर, मैं गिर गया हूँ। मेरे कपड़े गंदे हो गए हैं, मुझे शर्म आ रही है। मुझसे यह चढ़ाई नहीं होगी।”

महात्मा जी वापस आए और सुमित की आँखों में झांकते हुए बोले: “बेटा, देखो… जब तुम गिरे, तो तुम्हें चोट लगी, तुम्हारे कपड़े खराब हुए—यह असफलता है। यह जीवन का हिस्सा है। लेकिन…”

महात्मा जी ने अपनी लाठी ज़मीन पर जोर से पटकी और कड़क आवाज़ में कहा: “गिरने के बाद, जो तुम अभी कर रहे हो—वहीं बैठे रहना और खुद को बेचारा समझना—यह असली हार है। याद रखना, कीचड़ में गिरना शर्म की बात नहीं है, शर्म की बात यह है कि तुम कीचड़ को ही अपना नसीब मानकर वहीं घर बना लो।”

सुमित को जैसे बिजली का झटका लगा। उसे समझ आ गया कि गुरुजी सिर्फ पहाड़ी की बात नहीं कर रहे हैं, वे उसके जीवन की बात कर रहे हैं।

सुमित ने अपने आँसू पोंछे। उसने कीचड़ सने हाथों से ही ज़मीन का सहारा लिया और पूरी ताकत लगाकर खड़ा हो गया। उसने महात्मा जी से कहा, “गुरुवर, मैं चलूंगा। मैं गिरूंगा, फिर उठूंगा, लेकिन रुकूंगा नहीं।”

उस रात वे दोनों मंदिर पहुँचे। सुमित के कपड़े गंदे थे, शरीर थका था, लेकिन उसके चेहरे पर जीत की चमक थी—वह जीत जो गिरने के बाद उठने से मिलती है।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जब आप कोशिश करते हैं, तभी आप गिरते हैं। जो घर से निकलता ही नहीं, वह कभी नहीं गिरता। दुनिया आपको तब नहीं हराती जब आप गिरते हैं; दुनिया आपको तब हराती है जब आप उठने से मना कर देते है। जिसने धूल और कीचड़ का स्वाद नहीं चखा, वह शिखर की हवा का आनंद कभी नहीं ले सकता।

Shine wih us aloevera gel

Related posts

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—528

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—182

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—448

Jeewan Aadhar Editor Desk