धर्म

परमहंस स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—45

एक बार अर्जुन द्रौपदी को लेकर द्वारिकापुरी आये। अर्जुन श्रीकृष्ण के मित्र भी हैं, भक्त भी है, और बुआ के बेटे भाई भी है। शाम के समय सब मिलकर बाग में हास्य विनोद करते हुए टहल रहे थे। बगीचे में एक सुन्दर फूल गुलाब का था, जिसमें 9 रंग थे और वह खिला हुआ था, द्रौपदी उसको टकटकी बांधे देख रही थी।

श्रीकृष्ण समझ गए कि वह फूल द्रौपदी को पंसद है, तोडऩे के लिए हाथ बढ़ाया। फूल तो टूट गया, लेकिन हाथ में नुकीला कांटा चुभ गया, अंगुली से खून बहने लगा। सभी पट्टी तथा दवा लाने के लिए इधर उधर दौड़े, परन्तु द्रौपदी ने आव देखा न ताव,फौरन अपनी साढ़ी से एक पट्टी फाड़ी और अपने आंसु रूपी दवा में भिगोई और शीघ्रातिशीघ्र श्रीकृष्ण की अंगुली पर बांध दी। श्रीकृष्ण ने उसी क्षण यह सोच लिया कि इस पट्टी का उपकार मुझे किसी दिन चुकाना है।

चीर हरण का वह दिन आ गया और परमात्मा ने साढ़ी को इतना बढ़ाया कि साढिय़ों का ढेर लग गया, लाज रख ली एक नारी की उस परमात्मा ने।
प्रेमी भक्त सज्जनों छोटा सा पुण्य कार्य भी महान् फलदीयी बन जाता है। नेकी करो और कुएं में डालो। नेकी करके, उसे याद मत रखो, भूल जाओ और यदि कोई अपने हाथों पाप कार्य हो जाए तो उसको कभी भूलों मत, क्षण प्रतिक्षण उसको याद करो, प्रायश्चित्त करते रहो ताकि भविष्य में कभी दोबारा पाप न हो। जैसे आप बैंक में जो राशि जमा कराकर पांच साल तक उसे वापिस नहीं निकालते हो पह राशि ब्याज सहित आपको दुगुनि मिल जाती है। उसी प्रकार परमात्मा की सरकार भी आप द्वारा किए गए पुण्यों को बढ़ाकर, अधिक शुभ फल के रूप में वापिस लौटा देती है। इसीलिए पाप कार्य से बचो, दूसरों को भी बचाओं शुभ कार्य स्वयं भी करो, और दूसरों को भी प्रेरित करो।

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