धर्म

ओशो : कैवल्य उपनिषद 200

जब हम एक दफा, पहली दफा किसी व्यक्ति को पानी में फेंकते हैं तैरने के लिए, तब भी वह हाथ-पैर फेंकता है- थोड़े अव्यवस्थित। और वह जो अव्यवस्था होती है, वह भय के कारण होती है कि कहीं डूब न जांऊ। दस-पांच बार हाथ पैर फेंककर वह समझ जाता है कि डूबता नहीं हूं, कोई भय नहीं है। भय मिट जाता है, हाथ -पैर व्यवस्थित फेंकने लगता है, तैरना आ जाता है। तैरना जैसे उसे आता ही था, सिर्फ डूबने के भय के कारण व्यवस्थित नहीं हो पाता था। तैरना जैसे उसेें मालूम ही था, सिर्फ उसके प्रयोग करने की जरूरत थी। तो तैरना शायद सीखते नहीं, पुनस्र्मरण करते हैं। यह मैं एक उदाहरण के लिए कह रहा हूं।

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क्योंकि ठीक ऐसा ही ध्यान के संबंध में होता है। और ठीक ऐसा ही हृदय की गुफा में होता है। एक बार ध्यान आ जाए, तो फिर नही भूला जाता। एक किरण ध्यान की उपलब्ध हो जाए, एक झलक तो फिर उसे कभी नहीं भुलाया जा सकता। फिर कोई उपाय नहीं है। फिर आप वही आदमी नहीं हो सकेंगे, जो ध्यान के अनुभव के पहले थे। यह अनुभव अब आपकी आत्मा हो जाएगा। और यह इसलिए कि ध्यान भी सीखना कम है, शायद पुनस्र्मरण है। शायद ध्यान को हम जानते ही हैं किसी गहरे तल में। सिर्फ थोड़े -से अभ्यास की जरूरत है कि जिसे हम जानते ही हैं, वह प्रगट होकर जाना जा सके। शायद जो छिपा ही है, थोड़ी धूल-धवांस हटा दी जाए और निखर जाए और ताजा हो जाए। शायद कोई दर्पण, जिस पर धूल जम गयी है, पोंछ दिया जाए दर्पण में तस्वीर बन जाए।
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जब दर्पण में धूल जमी थी तब भी दर्पण ही था। धूल से दर्पण मिटता नहीं। लेकिन धूल से मेरा प्रतिबिंब बनना बंद हो जाता है। धूल हट जाती हैं, दर्पण तो पहले भी दर्पण था, अब भी दर्पण है, लकिन अब प्रतिबिंब बनता है। ध्यान भी ऐसी ही प्रक्रिया है, जिससे हम भीतर इकठ्ठी हो गयी धूल हो हटा देते हैं, दर्पण साफ हो जाता हैं। तैरना आ जाता है। और एक बार आ जाए, साफ हो जाए, तो फिर कला हमें आ गयी। फिर हम किसी बड़े-बड़े सागर में भी उतर सकते हैं। और दर्पण हमें मिल गया, उसमें हम- अब अपना ही नहीं, परमात्मा का भी प्रतिबिंब उपलब्ध कर सकते है। इसलिए उसे ब्रहालोक भी कहा। और कहा, वह परमतत्व भीतर गुफा में आलोकित है। जैसे कोई दीया जल रहा हो, चारों तरफ गुफा के बाहर अंधेरा हो और हम अंधेरे में जी रहे हो और गूफा के भीतर दीया जल रहा हो। और गुफा के भीतर हम जांए तो हैरान हों कि यह दीया तो सदा ही जल रहा था, यह ज्योति तो कभी बुझी न थी।
इस अंतर-गुहा में जलनेवाली ज्योति के कारण ही पारसियों ने निरंतर अपने मंदिर में आग को जलाने का प्रतीक चुना। लेकिन भूल गए कि यह आग किसलिए जला रहे हैं चीबींस घंटे। आग बुझे न जलती रहे, यह सिर्फ प्रतीक था। उस भीतर की गुफा में जरथुस्न्न को पता चला था, जरथुस्न्न ने जाना था कि भीतर की गुहा में जाकर देखा कि वहां जो ज्योति जलती है बिना ईधन के , बिना तेल के, और शाश्वत है, और कभी बुझी नहीं, वह जीवन का स्वरूप है , वही जीवन है। जरथुस्न्न को जो प्रतीत हुआ था, वह जरथुस्न्न के अनुयायियों ने मंदिर में स्थापित किया। सुंदर था। स्थापित करना सिंबॉलिक था। कलात्मक था। लेकिन हमारे सत्य संकेतों में खो जाते हैं।

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