धर्म

सत्यार्थप्रकाश के अंश—11

जिस मार्ग से इस के पिता,पितामह चले हों उस मार्ग में सन्तान भी चले परन्तु जो सत्पुरूष पिता पितामह हों उन्हीं के मार्ग में चलें और जो पिता पितामह दुष्ट हो तो उन के मार्ग में कभी मत चलें। क्योंकि उत्तम धर्मात्मा पुरूषों के मार्ग में चलने से दु:ख कभी नहीं होता इन का तुम मानते हो व नहीं?
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और देखो जो परमेश्वर की प्रकाशित वेदोक्त बात है वही सनातम और उस के विरूद्ध है वह सनातम कभी नहीं हो सकती। ऐसा ही सब लोगों को मानना चाहिये वा नहीं?
अवश्य चाहिये।
जो ऐसा न माने उस से कहो कि किसी का पता दरिद्र हो उस का पुत्र धनाढय्य होवे तो क्या अपने पिता की दरिद्रावस्था के अभिमान से धन को फैंक देवे? क्या जिस का पता अन्धा हो उस का पुत्र भी अपनी आंखो को फोड़ लेवे? जिस का पिता कुकर्मी हो क्या उस का पुत्र भी कुकर्म को ही करें? नहीं-नहीं किन्तु जो-जो के उत्तम कर्म हों उन का सेवन और दुष्ट कर्मो का त्याग कर देना सब का अत्यावश्यक है।
जो कोई रज वीय्र्य के योग से वर्णाश्रम-व्यवस्था माने और गुण कर्मो के योग से न माने तो उस से पूछना चाहिये कि जो कोई अपने वर्ण को छोड़ नीच, यहां यही कहोगे कि उस ने ब्रहा्रण के कर्म छोड़ दिये इसलिये वह ब्रहा्रण नहीं है। इस से यह भी सिद्ध होता है जो ब्रहा्रणादि उत्तम कर्म करते हैं वे ही ब्रहा्रणादि और जो नीच भी उत्तम वर्ण के गुण, कर्म ,स्वभाव वाला होवे तो उस को भी उत्तम वर्ण में और जो उत्तम वर्णस्थ होके नीच वर्ण में गिनना अवश्य चाहिये।
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