धर्म

ओशो : ध्यान है परमात्मा

अक्सर तुम हारते हो,क्योंकि क्षुद्र से लड़ते हो, पहली बात । और कभी-कभी विराट की आकांक्षा से भी भरते हो,लेकिन तुम्हारे पास आशीष की संपदा नहीं होती। तुम अकेले पड़ जाते हो। दूर किनारा। विराट तो बहुत दूर हैं, पता नहीं कहां है किनारा। यह किनारा तो हमें पता हैं, दूसरा किनारा,वह दिखायी भीं नहीं पड़ता, सागर का दूसरा किनारा,उसकी यात्रा पर चलते हो। घबड़ाहट होती है। यह किनारा छोडऩे में घबड़ाहट होती हैं। इसीलिए तो जब तुम ध्यान करने बैठते हो,तो तुम्हारे विचार का किनारा नहीं छूटता। मन पकड़-पकड़ लेता है। मन कहता है कि जो परिचित हैं, उसको मत छोड़ो। जिसमें परिचय हैं, उसमें सुरक्षा हैं। यह जाना-माना हैं, पहचाना हैं, अपना हैं यहां रहे हैं जन्मों -जन्मों से। तुम कहां जाते हो। किस किनारे की तालाश करते हों? कहीं भटक न जाओ,कहीं सागर में डूब न जाओ। कहीं ऐसा न हो कि यह किनारा भी हाथ से जाए और दूसरा भी न मिले। दूसरा है इसका पक्का क्या हैं? किसने तुमसे कहा कि दूसरा किनारा हैं? तुमने तो नहीं जाना। कहीं ऐसा न हों कि तुम किसी प्रंवचना में पड़ गए हो। कि किसी झूठे सपने ने तुम्हें पकड़ लिया हैं।

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मन तुम्हारी सुरक्षा के लिए कहेगा:रूके रहो इसी किनारे पर। विचार के तट पर ही रूके। विचार है यह किनारा ध्यान है वह किनारा। विचार है संसार,ध्यान है परमात्मा।
तो तुमने देखा:तुम ध्यान करने बैठते हो,कितने विचार उठते हैं। ज्यादा उठते हैं। उससे ज्यादा उठते हैं,जितना कि जब तुम ध्यान करने नहीं बैठते। चौबीस घंटे हजार काम में लगे रहते हो,इतने विचार नहीं सताते। घंटेभर आंख बंद करके बैठ जाओ आसन लगाकर। तुम इतने हैरान हो जाते हो कि मामला क्या हैं। क्या विचार प्रतीक्षा ही करते थें कि करो,बच्चू ध्यान करो, फिर तुम्हें बताएंगे। सब तरफ से टूट पड़ते हैं। सब दिखाओं से हमला बोल देते हैं। जैसे प्रतीक्षा में ही थे कि करो ध्यान, तो मजा चखांए।
आने लगते हैं सब तरह के विचार-धन के, वासना के, काम के, राजनीति के, यह-वह,कूड़ा -करकट-सब। अखबार उड़े आते हैं। सब। एक दिशा से नहीं, सब उठ आते हो। सोचते हो: इससे तो जब हम काम में लगे रहते हैं, तभी कम विचार होते हैं।
ऐसा क्यों होता हैं? इसीलिए होता है कि मन तुम्हारी सुरक्षा कर रहा है। मन कह रहा है:कहां जाते हो। जिस लक्ष्य का कोई पता नहीं,जहंा तुम कभी गए नहीं,जिसका कोई स्वाद नहीं, किस मृग-मरीचिका के पीछे जा रहे हों? व्यावहारिक बनो। जो जाना-माना हैं, परखा है, उसी को पकड़े रहो।
इयलिए आशीष की जरूरत हैं। आशीष का अर्थ है:हम तो इस किनारे है, उस किनारे से कोई पुकार दे दे। और जैसे तुम डर रहे हो,मैं भी डरता था। डरो मत,पहुंचना होता है देखो मैं पहुंच गया।
बुद्धों का सत्संग खोजने का और क्या अर्थ होता हैं। यही कि किसी ऐसे आदमी के पास होना,जो अनुभव से कह सके कि पहुंच गया हूं। शास्त्रों से नहीं,अनुभव से, जो गवाह हो, जो साक्षी हो। जो यह न कहे कि मैं परमात्मा को मानता हूं। जो कहे, मैं जानता हू। जो इतना ही न कहे, जानता हूं बल्कि कहे कि मैं हूं।
ये तीन अवस्थाएं है, मानना, जानना, होना।

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