हिसार

ग्वार फसल में उखेड़ा व झुलसा रोग का इलाज संभव – डा.बीडी यादव

हिसार,
ग्वार फसल में उखेड़ा व झुलसा रोग एक गम्भीर समस्या बनती जा रही है। किसानों को अधूरी जानकारी होने के कारण इसकी सही रोकथाम नहीं कर पाते जिसके कारण किसान पूरी पैदावार नहीं ले पाते। यह दोनों मुख्य बीमारियां ग्वार की पैदावार को काफी प्रभावित करती हैं, जो किसानों के लिए चिंता का विषय है। यह बात चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विष्वविद्यालय हिसार से सेवानिवृत ग्वार वैज्ञानिक डॉ. बीडी यादव ने कही। वे कृषि विभाग हिसार के तत्वावाधान में गांव न्योली खुर्द में आयोजित किसान गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। गोष्ठी में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के जिला सलाहकार डॉ. आरएस ढुकिया ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत की।

मुख्यातिथि डा. ढुकिया ने कहा कि इस गोष्ठी का मुख्य उद्देश्य किसानों को बीज उपचार तथा ग्वार की पैदावार बढ़ानें की तकनीक के बारे में प्रेरित करना है। डॉ. ढुकिया ने किसानों को सलाह दी कि बिजाई से पहले अपने खेतों की मिट्टी व पानी की जांच अवश्य करवायें। इस कार्य के लिए कृषि अधिकारी से जरूर सलाह लें। इसके साथ-साथ किसानों से आग्रह किया कि बीज खरीदते समय दुकानदार से पक्का बिल अवश्य ले और बीज सरकारी एजेंसियों से ही खरीदने की कोशिश करें। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि ग्वार की अच्छी पैदावार लेने के लिए ग्वार की उन्नत किस्में एचजी 365, एचजी 563 व एचजी 2-20 ही बीजें। उन्होंने ग्वार बिजाई के लिए जून का दूसरा पखवाडा़ सबसे उचित बताया।

डॉ. बीडी यादव ने शिविर में किसानों को संबोधित करते हुए उखेड़ा व झुलसा रोग से संबंधित जानकारी दी। उन्होंने कहा कि उखेड़ा रोग के जीवाणु जमीन के अंदर रहते हैं जो बीज के उगते ही पौधों की जड़ों पर आक्रमण कर देते हैं जिसके कारण जड़ें काली हो जाती हैं तथा पौधें जमीन से नमी व आवश्यक पोषक तत्व नहीं ले पाते, जिसकी वजह से पौधें मुरझाकर मर जाते हैं। उन्होंने बताया कि यह भूमि जनित रोग है अतः इसकी रोकथाम का सरल व सस्ता उपाय कार्बन्डाजिम-50 प्रतिशत को 2-3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से सुखा उपचारित करने के बाद ही बिजाई करें। मात्र बीज उपचार से उखेड़ा बीमारी पर 80 से 95 प्रतिशत काबू पाया जा सकता है। उखेड़ा बीमारी के लिए बीज उपचार ही एक मात्र उपाय है।

डॉ. यादव ने बताया कि उखेड़ा रोग के अलावा ग्वार फसल पर झुलसा रोग भी आता है जो कि पैदावार पर बुरा असर डालता है। इस बीमारी से ग्वार फसल पर किसान जब 25 से 30 प्रतिशत बीमारी आ जाती है तो उसके बाद ही इस बीमारी की रोकथाम के लिए स्प्रे करने की सोचता है। अधूरा ज्ञान होने की वजह से फसल की पैदावार को काफी कम कर लेता है। इसलिए ग्वार विशेषज्ञ ने किसानों को गोष्ठी में सलाह दी कि इस झुलसा (फंगस) बीमारी की रोकथाम के लिए जब फसल 40-45 दिन की हो जाए, 30 ग्राम स्ट्रैप्टोसाइक्लिन तथा 400 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराईड-50 को 200 लीटर पानी प्रति एकड़ में मिलाकर छिड़काव करें तथा दूसरा स्प्रे इसके 12 से 15 दिन के अंतराल पर करें।

इसके साथ-साथ इस फसल पर हरा तेला तथा सफेद मच्छर का आक्रमण होता है। इसकी रोकथाम के लिए 200-250 मिली लीटर मैलाथियॉन-50 ई.सी. या डाइमेथोएट (रोगोर) 30 ई.सी. को उपरोक्त घोल में मिलाकर स्प्रे करें। घोल बनाते समय एक विषेष सावधानी बरतनी है कि स्ट्रैप्टोसाइक्लिन व कॉपर ऑक्सीक्लोराईड का घोल अलग-अलग बनाकर फिर सिफारिषषुदा पानी में मिलाना है तथा कीड़ें मारने की दवाई उसके बाद डालनी है। इस गोष्ठी में मौजूद 47 किसानों को एक एकड़ की बीज उपचार की दवाई सम्पल के तौर पर दी गई। इस अवसर पर गांव प्रगतिशील किसान शीशपाल, नरसिंह, संदीप, लीलू, ओमप्रकाश, नेकी राम आदि मौजूद थे।

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