धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—151

ब्रह्माजी की इच्छा हुई “सृष्टि रचें।” उसे क्रियान्वित किया। पहले एक कुत्ता बनाया और उससे उसकी जीवनचर्या की उपलब्धि जानने के लिए पूछा -“संसार में रहने के लिए तुझे कुछ अभाव तो नहीं ?’ कुत्ते ने कहा -“भगवन्‌! मुझे तो सब अभाव ही अभाव दिखाई देते हैं, न वस्त्र, न आहार, न घर और न इनके उत्पादन की क्षमता।”

ब्रह्माजी बहुत पछताए। फिर रचना शुरू की – एक बैल बनाया। जब अपना जीवनक्रम पूर्ण करके वह ब्रह्मलोक पहुँचा तो उन्होंने उससे भी यही प्रश्न किया।

बैल दु:खी होकर बोला -“भगवन्‌! आपने भी मुझे क्‍या बनाया, खाने के लिए सूखी घास, हाथ-पाँवों में कोई अंतर नहीं, सींग और लगा दिए। यह भोंडा शरीर लेकर कहाँ जाऊँ।”

तब ब्रह्माजी ने एक सर्वाग सुंदर शरीरधारी मनुष्य पैदा किया। उससे भी ब्रह्माजी ने पूछा -“वत्स, तुझे अपने आप में कोई अपूर्णता तो नहीं दिखाई देती?” थोड़ा ठिठक कर नवनिर्मित मनुष्य ने अनुभव के आधार पर कहा -“भगवन्‌! मेरे जीवन में कोई ऐसी चीज नहीं बनाई जिसे मैं प्रगति या समृद्धि कहकर संतोष कर सकता।”

ब्रह्माजी गंभीर होकर बोले -‘वत्स ! तुझे हृदय दिया, आत्मा दी, अपार क्षमता वाला उत्कृष्ट शरीर दिया। अब भी तू अपूर्ण है तो तुझे कोई पूर्ण नहीं कर सकता।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, यही मानव जीवन है। इसमें संतोष नहीं है। मनुष्य का हृदय कभी भी किसी से संतुष्ठ नहीं हो सकता।

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